"नाम" नागेश जय गुरुदेव (दीपक बापू)

सोमवार, 28 मार्च 2016

उत्पत्ती

उत्पत्ती


बहुत दिन बीत गए मैं कुछ लिख नहीं पा रहा था उसके कारन बहुत से है अलग-अलग तरह के मगर उसे जाने दीजिये कोई मतलब नहीं निकलता है उनका! आज मैं कुछ इम्पोर्टेन्ट चीज़ो को विस्तार कर के बताने जा रहा हूँ! जिसके लिए हम शुन्य अर्थात एकदम पहले से शुरुआत करेंगे! सब से पहले की हम यहाँ क्यों है?? इसके तो शॉर्टकट में फ़िलहाल उसका जवाब यही है जिसको ज्यादातर लोग मान्य करेंगे की हम यहाँ पे अपने जीवन को सफल बनने के लिए ही आये है! अपने जीवन की हर चाहत को पूरा करने के लिए ही यहाँ आये है! इसके आलावा कोई और उद्देश्य या कहे लक्ष्य है ही नहीं! मगर एक बार दिल पे हाथ रख के देखिये की आप अपने को सफल बनाने के चक्कर में समाज देश दुनिया को दिखने के चक्कर में खुद को कितना खो चुके है! हक़ीक़त में हम यहाँ उस इश्वर की खोज उसका अस्तित्व उसकी चरण की शांति को खोजने के लिए ही आये है, अजीब अजीब तरीके से लोग उसे मनाने की कोशिश करते रहते है और इस चक्कर में कई बार उलटे पुलटे काम भी कर जाते है! मगर हम इस मायानगरी में आने के बाद अपनी चाहत की दिशा बदल देते है चाहत कुछ और होती है मगर चकाचौंध देख के वह बदल जाती है ऐसा क्यों होता है अखिर हम इसके बहार क्यों नहीं आ पते है जी हाँ ये बात सच है की हम जानते हुए भी बेवकूफ़ बनते है और अपने दिल को कुछ और बेवकूफो के ज़रिए दिलाशा भी देते है की "WE ARE RIGHT" And things are just to happen" ये सब होने के लिए ही है और हम सही है, पर क्यों ऐसा सोचना अगर गलत है तो क्यों गलत है! और अगर सही है तो क्यों सही है! सब से पहले तो हम ये देखेंगे की उत्पत्ति कैसे हुयी है यहाँ जो में लिख रहा हूँ उसका हिसाब किताब कितने लोग मानते है या नहीं मानते है ये मैं नहीं जानता हूँ ये एक सोच है जिसे मैंने पन्ने पे उतरा है और मुझे इसका इससे ज्यादा अच्छा सही और मजबूत विचार कही और मिला नहीं है कम से कम अब तक तो बिलकुल भी नहीं!!!!!!! ये दुनिया आग का गोला थी जिसे हम सूर्य का ही एक भाग कह सकते है और हक़ीक़त भी यही है की यह सूर्य का या सूर्य के सामान किसी बड़े तारे का ही भाग थी या जो भी हो चाहे! पर थी तो ये आग का ही एक गोल करोड़ो वर्ष बीतते गए और इस आग के गोले की बाहरी परत (सतह) ठंडी पड़ती गयी और जैसा की हम सभी जानते है की सूर्य से आने वाली किरण डायरेक्ट यहाँ तक नहीं पहुंचती है जिसके कारन टेम्परेचर बढ़ता नहीं है और यही कारन था की आग का ये गोल जल जल के खुद-बा-खुद ठंडा पड़ने लगा! ये सब पहले से इतनी आसानी से हो गया ऐसा बिलकुल भी नहीं है क्योकि हम आज सूर्य की किरणों से बच्चे है क्योकि वह डायरेक्ट हमारी पृथ्वी पे नहीं आती है पर शुरुआत में वह आ रही थी पर रासायनिक क्रियाओं के होते रहने से पृथ्वी में घर्षण के कारन गुरुत्वाकर्षण का निर्माण हो रहा था और आकाश में खंडित हो कर विचरने वाले कई तत्वों को अपने में समाहित कर रहा था जिसके कारन पृथ्वी से ऊपर गैस के रूप में एक वातावरण का निर्माण हुआ जिसने सूर्य की किरणों को फ़िल्टर करना शुरू कर दिया, और इसकी बाहरी परत धीरे धीरे सख्त होने लगी सख्त होने के साथ में जो आग में से गरम हवा सराउंड किये हुए थी उनमे केमिकल रिएक्शन हुआ और वह भाप (गैस) में से कन्वर्ट होक लिक्विड फॉर्म में आने लगे और जैसा की हम सभी इस बात से परिचित है की "Earth is totally surrounded in-fact mostly part of earth is covered by water" पृथ्वी पूरी तरह से लगभा ९५% से ज्यादा पानी से ही ढकी हुयी है! और ये भी सच बात है की उस समय में आग के इस गोले की गर्मी को माप निकल पाना थोड़ा मुश्किल ही है और जैसे जैसे वर्षो बीतते गए तब पिघले हुए वस्तुओं में से बनने वाली गैस की मात्र भी एक ऊँचे लेवल पे पहुंची थी और गैस से लिक्विड भी उतने ही ऊँचे लेवल पे हुआ जिसके कारन लिक्विड की मात्र बहुत ज्यादा बढ़ गयी! मगर यह प्रथम प्रक्रिया थी जिसमे पानी का जिसको सही तौर पे समझने के लिए गहन अध्ययन की जरुरत है और उसमे तो पूरी बुक ही भर जाए पर यहाँ हम थोड़ा सा शॉर्टकट ले रहे है और आगे बढ़ रहे है, जैसा की हमने देखा की ये लिक्विड में ट्रांसफर होने के बाद जब बारिश के रूप में इस ज़मीन पे पड़ा तो ज़मीन में मौजूद केमिकल्स के साथ हुए रिएक्शन एक साथ ये एक हो गए और पानी में मिल गए और ये तो साफ है की यह पानी पीने लायक तो बिलकुल भी नहीं था और ये शुरुआती दौर था हमारे पृथ्वी के बनने का! अब जैसा की यहाँ तक हमने देखा की अपनी प्यारी पृथ्वी (Earth) बन के तैयार थी जिसपे वाटर / एयर / और सूर्य / चन्द्र प्रकाश भी था! अब आगे… ये लाइन आप को याद होगी “चौथी सलाम करू चारो खानी एक बीजक नई जगत बंधाणी” सात सलामी की सखी से ली हुयी इस सलामी का डिटेलिंग हम पहले ही कर चुके है (http://santnagesh.blogspot.com/2016/03/pratham.html) इसमें एक वर्ड आया है ओसवाल ये एक खानी है “खानी” कहे तो पैदावार की टाइप हवा से जो पैदाइश होती है वह ठीक इसी प्रकार पानी में मिले हुए केमिकल और बाहरी पर्यावरण में फैले हुए कुछ “अनु” ने साथ में रिएक्शन कर के सब से पहले एक जीव की उत्पत्ति की जो की बिना किसी कोशिका के था जिसे साइंस ने अमीबा का नाम दिया है यही अमीबा आगे चल के थोड़ा फैला और रिएक्शन्स भी बढे जिनमे से कीड़ी मेरा मतलब की चींटी वगेरा टाइप के जानवर हुए इनकी गलत ब्रीडिंग या मिक्स ब्रीडिंग ने दूसरे और जीव को पैदा किया और इनके साइज आपसी मिक्स ब्रीडिंग के कारन धीरे धीरे बढ़ने लगे और एक विशाल रूप लेने लगे जो की हम सब जानते है बन्दर गर्रिला चिम्पांजी डायनासोर इत्यादि… इसके आगे की कहानी मानव के विकास की वह तो सर्व व्यापक है और सभी को पता है इसीलिए इसकी ज्यादा डिटेलिंग यहाँ करने की कोई जरुरत नहीं है और अब जब हम आगे बढ़ेंगे आध्यात्मिकता की और तो ये सवाल सब से पहले आएगा की “ये यहाँ क्यों हुआ सूर्य के चारो तरफ same distance पे दूसरी जगह या किसी और जगह क्यों नहीं हुआ और अगर ये हुआ तो यहाँ पे ही क्यों हुआ किसीने बोला था किसने बोला था तो वह कौन था और क्यों था” इसकी जानकारी ही हमारा मैन उद्देश्य है और इसके बारे में हम जो भी लिखेंगे वो सब कुछ एक पुख्ता सबूत के साथ हो सच हो और तर्क सहित हो इसकी मैन अपने तरफ से भरसक कोशिश करूँगा

"यत्र तत्र सर्वत्र"

"यत्र तत्र सर्वत्र हर तत्वों में घट घट में हर लोक में मैं समाया हूँ ये सही भी मैं हूँ गलत भी मैं हूँ सुर भी मैं हूँ सुरता भी मैं हूँ मैं राग हूँ मैं बैराग हूँ मैं साधू मैं शैतान हूँ सब कुछ  में मैं हूँ उस शुन्य में भी मैं हूँ"

ये कथन सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूँ स्वयं प्रभू श्री कृष्णा ने कहा है की वह हर जगह है हर व्यक्ति में है और ज्यादातर लोग इस बात को जानते है  स्वीकारते भी है और अपने अपने हिसाब से उसे  प्रयोग में लाते है अब मैं भी अपने हिसाब से अपनी सोच से लोगो से जानकारी हासिल कर कर के जिस नतीजे पे पंहुचा हूँ उसका एक निचोड़ यहाँ आप के समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ !

जैसे की मैंने पहले ही कहा की हर व्यक्ति अपने हिसाब से इस जानकारी को  उपयोग करता है और कई बातो में तर्क गलत तरीके से या सही तरीके से देता ही है !
          
                   संत महात्मा गुरु सभी घुमा फिरा के इसी बात के आगे पीछे घूमते है "कि वह तुम्हारे अंदर है वह तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ता तुम उसमे से ही आये हो उसने तुम्हारी रचना की है तुम्हारी जीवन की बागडोर उसके ही हाथो में है"  अरे भाई ये बात तो हमे मालूम है सिर्फ कुछ उदहारण और  कहानियो के  तर्ज पे आप हमपे क्या थोप रहे है क्या आप  शिष्यों की गिनती बढ़ा रहे है क्या आप अपने कर्मो में पुण्य की गिनती बढ़ा रहे है की वह जब  लेखा जोखा लेके बैठे तो आप  अपने पास अपने शिष्यों का भी उदहारण दे के उसे बेवक़ूफ़ बनाने के लिए रखे, ‘की ये तो भटका था इसे आपकी जानकारी मैंने दी है और अब इसको मैंने ज्ञान दिया है की आप हर जगह हो और इसमें भी आप बस्ते हो करके यह गलत काम न करे वर्ना इसको कष्ट भोगना पड़ेगा’  और ऊपर वाला इसको आप की समझदारी मानते हुए इस बात से खुश हो जायेगा और आप को जीवन मरण/ ८४ लाख योनि के जंजाल से मुक्ति दे देगा

क्या मेरा  ये सोचना गलत है अगर गलत है तो मुझे बताईये और अगर सही लगता है तो इसे आगे पढ़िए

हर किसी में यदि हरी है  तो वह मिलेगा ही मुझे पक्का नाम तो नहीं पता पर शायद मीरा बाई के ये वचन थे  "मेरी भक्ति की कोई सीमा न हो तुझे पाने की चाहत इतनी रहे की मजबूर कर दू तुझे आने के लिए आना तो तुझे पड़ेगा ही मिलना तो हमारा पक्का है बस देखना यही है की मैं तुझसे मिलने आऊ या तू मुझ से मिलने आएगा"
इन शब्दों के अर्थ को अगर हम जाने तो यही है की हमे उसे भूलना नहीं है हर पल हर वक़्त याद रखना है और अपने आप को उसके लिए पूरी तरह से समर्पित कर देना है फिर भले ही उसके इन्तेजार में उसे पाने की चाह में पूरी ज़िन्दगी निकल जाये तो भी परवाह नहीं


"दिया है तूने तुझे ही लौटाना है माटी की काया को तो माटी में  ही मिल जाना है"(न.)


उसको ढूँढना मुश्किल है नामुमकिन नहीं है और ये विश्वास सब से पहले हमे अपने मन में बनाना है और मुश्किल तो आना ही है क्योकि हम जिसे ढूंढ रहे है उसे जान ले की वह कोई आम आदमी या कोई आम जगह वस्तु या कोई ग्रह नहीं अपितु स्वयं ब्रह्माण्ड का रचयिता सर्वोप्परी सर्वैश्वर दीनदयाल परमात्मा है तो कुछ तो बात होगी उसमे!

“कर्मणयेवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।”

अर्थात कर्म करने का अधिकार आप के पास है और वह आप को करना है उसके कर्म का फल कब कैसे देना है या मिलना है इसकी  व्यर्थ आपको विचारने की जरुरत नहीं है
आप अपने कर्म को करते चलो और आनेवाले परिणाम के लिए अपने को दोषी निर्दोषी कुछ भी मत समझो ये सब लेखा उसके हाथो में छोड़ दो वह अपना काम भली भांति जनता है कम शब्दों में कहा जाये तो " कर्म करते चलो फल की चिंता छोड़ दो "  प्रभु में ध्यान लगाने का मतलब ये नहीं होता है की आप अपने कर्तव्यों से मुख मोड़कर उसके नाम का गुणगान गाते रहे इससे वह रीझेगा नहीं खिजेगा जब आप जन्म लेते है तब आप अपने आस पास के रिश्तो में बांध जाते है जो गिनती में तक़रीबन ७० रिश्ते है या यु कहे की ७० अलग अलग तरह के कर्जे है जिनकी भरपाई आप को करनी ही है वर्ना जिसे आप ढूंढने की सोच रहे है उसे ढूंढना तो दूर उसके मिलने का रास्ता तक आप को नहीं दिखेगा

अब आप का अगला सवाल होगा की जब ७०(APPROX.) तरह के अलग अलग कर्जे है तो हम कैसे पता करे की ये खत्म हुए या नहीं तो इसके लिए  मेरे खुद का किया हुआ एक साधारण सा प्रयोग बताता हूँ जिसे मुझे एक महातम ने बताया था अपने कानो को दो हाथो से भली तरह से बंद करो और मस्तिष्क में होने वाली कम्पन्न पर ध्यान केंद्रित करो देखो क्या आवाज़ है कौन सी आवाज़ है यकीन मानिये   ये आवाज़ आप को आये न आये पर जिसका कर्ज  बाकि है वह जरूर दिखेगा या उसका आभास होगा बस तो देर किस बात की है उसे निपटारा पाओ और जब तक आप का ध्यान सही न लगे उस अनहद नाद की आवाज़ न सुनाई दे ध्यान लगते रहो यकीन करो मेरा क्योकि तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारे मन को यथार्थ के दर्शन करा सकता है

हर कार्य को करने के पहले अपने मन को सुनिश्चित कर ले अपने आप को उस चीज़ के लिए पूरी तरह  से तैयार कर ले क्यों की यदि आप का मन उस के लिए तैयार नहीं है तो आप कुछ नहीं कर पाएंगे

दिमाग अलग अलग तरह के सवाल को खड़ा करता रहता है की अगर भगवान के मिलने के पहले अगर हमको सब तरह से मुक्त होना है जैसे की कर्ज मुक्त पाप मुक्त तो आखिर कब कैसे होगा ये सब हमे काम धंधा करना ही पड़ेगा अगर घर वालो को खिलाना है पालन-पोषण करना है उनका तो यानी हम अगर काम धंधा करेंगे तो हमे झूठ बोलना ही पड़ेगा और अगर हम झूठ बोलेंगे तो कर्म बढ़ेंगे फिर आखिर कब हम  उसके दर्शन कर पाएंगे ???
इस सवाल का जवाब है जी हाँ इसका जवाब ये है हमें अपने बच्चो का भला करने में कितना टाइम जायेगा ४० साल ५० साल ६० साल जो भी लगे उसके बाद जो बचेगा उस टाइम को प्रभु चरण में लगाइये !!
अब आप का सवाल होगा की तब तक में अगर हमें कुछ होगया तो क्या फिर हमें उसी ८४ के जाल में फसना पड़ेगा तो इसका जवाब है नहीं आप को ये याद रखना है की ऊपर वाला दयालु है वह फिर से आप को इसी योनि में डालेगा और इस बार आप के पास समय भी सिमित होगा और आप जल्द से जल्द उसे पा लेंगे और अपने

कर्मो से मुक्त होंगे तो इस बात को क्लियर कर ले की उसके मार्ग पर एक चलना शुरू कर दिया तो सब कुछ आसान होता जायेगा बस अपना विश्वास बनाये रखे !!

"पशु कि पनिया बने नर का कछु नहीं होए जो नर करनी करे तो नर से नारायण होए"

"पशु कि पनिया बने नर का कछु नहीं होए
जो नर करनी करे तो नर से नारायण होए"
इस साखी में बताया है की एक पशु तक इतना उपयोगी होता है की उसके शरीर के भागो से कुछ न कुछ वस्तुए बनती है पर नर इतना अभागा है की उसका कुछ नहीं होता है पर नर की करनी मतलब उसके कर्म यदि सही हो तो वही नर नारायण भी बन सकता है  आज इसी बात पे हम तरह - तरह से नज़र डालेंगे


मनुष्य अवतार वह अवतार है जिसकी पाने की इक्षा मात्र से भगवन भी धरातल पर उतर आते है !
मत्स्य / कुर्मा / वराहा / वामना / परशुराम / गौतम बुद्धा* / श्री राम / श्री कृष्णा / नरसिम्हा / कलयुगी कल्कि* ये सब उदहारण है प्रभु के आगमन के जिसके बारे में हम सभी लोग ज्यादातर जानते ही है


आखिर क्या है ये मनुष्य अवतार क्यों है ये मनुष्य अवतार इसे समझना या समझाना मुश्किल नहीं है मगर इस मोह माया भरी दुनिया में हम लोग इतने भ्रमित हो चुके है की हममें समझने की ताकत ही नहीं रही

"पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात."

कबीर का कहना है कि जैसे पानी के बुलबुले होते है ठीक इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे दिन का उजाला होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी. और हम सभी इस बात को भलीभांत जानते है


फिर भी हम अपने आप  से बांज नहीं आते!
 मनुष्य को जीवन का सत्य पता करना बहुत जरुरी है इस नश्वर श्रुष्टि में हर कलाकार को अपना किरदार पता होना जरुरी है अन्यथा जीवन व्यर्थ ही कहलाता है! जब इस धरती पे आते है तब हम अनेक तरह के रिश्तो में बांध दिए जाते है और जिसने जन्म दिया है उसके ऋणी बन जाते है इन ऋणों को चुकाना अत्यंत आवश्यक है
बिना इस ऋण को चुकाए यदि हम सत्कर्म भी करने की सोचे तो भी फलित नहीं होता है इसीलिए पहले इनसे निपटिये और भाव भक्ति में लग जयिय ए क्योकि उस ऊपर वाले ने आप को मनुष्य अवतार दिया है ताकि आप उसे याद कर सको और दुसरो को भी उसकी महत्ता समझा सको और अपने साथ साथ और लोगो के जीवन को सार्थक बना सको

इस धरती  पर जन्मे हर सजीव की कोई न कोई उपयोगिता है ही फिर वह पेड पौधे हो पहाड़ जंगल या मनुष्य हो इन सब का कुछ न कुछ काम अवश्य है सभी एक दूसरे पे जाने अनजाने निर्भर करते ही है इस प्राणी श्रृंखला में अगर देखा जाये तो सबसे मूरख और सबसे समझदार भी स्वयं मनुष्य है परन्तु उसके नासमझी के कारन वह किसी काम का नहीं होता है जब की पशु पेड पौधे हर रूप से काम आते ही है जब तक मनुष्य अपने आप को नहीं जानेगा नहीं पहचानेगा  तब तक उसके जीवन का कोई मोल नहीं है और वह नाकारा की गिनती में ही है परन्तु वही नर  यदि अपने कर्मो को भलीभांति करे प्रभु में लीन रहे समाज की बुराइयो को दूर करे इंसानी दुष्ट प्रकृति को सुधार दे या उसके तरफ अग्रसर रहे तो वही नर नारायण भी बन सकता है जिसके बहुत से उदहारण हमारे संत महात्मा है जिन्हे इंसानियत के आलावा और कोई जात धर्म का परवाह नहीं था उन्होंने सभी को  एक सरीखा ही गिना कबीर का लिखा हुआ दोहा

"कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर
ना किसी से दोस्ती ना किसी से बैर"

उपरोक्त पंक्ति लिखे हुए शब्दों की सत्यता दर्शाती है ना सिर्फ कबीर बल्कि दूसरे सभी संत फ़क़ीर जलाराम बापा, बजरंग दास, तुकाराम, मोरारी बापू, कानदास, सेवादास, परब वाला और न जाने कितने ही ये सभी इस सत्य  को जानते थे और इसीलिए उन्होंने अपने साथ साथ सभी का उद्धार किया

Pratham - प्रथम

ज़िन्दगी जीने के लिए दुनिया में हमें उस ऊपर  वाले ने भेजा है और हम इस बात को अच्छी तरीके से जानते है की हमे उसने सिर्फ अच्छा काम करने के लिए ही भेजा है फिर भी  इस दुनिया की बुराई हमे अपने में जकड लेती है और हम अपने किये हुए वादो को भूल जाते है जो हमने इस ज़मीन पे जीवन पाने के पहले किये थे !

"कॉल बचन दे बाहेर आयो, आकर लोभ में चित्त लगायो"

सत्तार साहेब की ये पंक्ति इस बात की याद दिलाती है

बड़ी ही खुबशुरत वाणी है "भजन बिना नर है पशु के सामान"




क्या है वो सच आखिर क्या वादा किया था हम ने कौन सा कॉल था वह??


इस लेख में मैंने जो भी लिखा है वह सब उस सच को ढूंढने के समय में मुझे मिला है, हर व्यक्ति इस सत्य को प्राप्त कर सकता है उसे ज्यादा मेहनत न करनी पड़े इसीलिए उसका एक साधारण रुप से मैं यहाँ वर्णन कर रहा हूँ यदि कोई गलती, भूल हो जाए या शब्दों में कोई कमी रहे तो इसे मेरी नादानी या नासमझी ही समझना क्योंकि जिसने मुझे बताया वह सही था, है और रहेगा।..


इस चीज़ की शुरुआत कैसे करूँ मुझे पता नहीं है इसीलिए  मुझे ज्यो ज्यो याद आ रहा है मैं उसको यहाँ लिखते जा रहा हूँ


सब से पहले दास सवा बापू की सलामी जिसने सब से पहले मेरे मस्तिष्क में अपनी छाप छोड़ी


(१) "पहली सलामी पृथ्वी ने करिये जेनी पीठ पर पग दाई फरिये
करू परिक्रमा शीश नामवि सवा शेर नि जेने काया बनावी"


अर्थ


इसके अर्थ हर कोई अपने हिसाब से  निकलता है जिसमे सब से सिंपल यही समझ में आता है की
(१) यह  पृथ्वी/जमीन/धरातल/धरतीमाता/मृत्युलोक और न जाने किन किन नामो से हमारे संतो पुरखो ने इसे नवाजा है ! इसने हमे सबसे पहले अपने ऊपर (पीठ) खड़े रहने बैठने घर बनाने और न जाने क्या क्या करने के अवसर दिए  यदि यह धरती न होती तो हम क्या करते इस्का हम अंदाज़ा  भी नहीं लगा सकते है इसीलिए ऐसी धरती को महान समझना हम सभी का परम कर्त्तव्य है  यदि ये न होती तो किस जगह राम-रावण, कृष्णा-कंश, नरसिम्हा-हिरण्यकश्यप ये सब कहा आते कहा अपनी लीलाओ को दिखाते जनमानस को बोध कराते इसका जवाब शायद हमारे पास नहीं है सिर्फ इतना  ही नहीं अतएव यही है जिसने अपने गर्भ की गर्मी से अपने उपजाऊ जमीन से हमें अन्न वस्त्र और पुजीविका के साधन उपलब्ध कराये है इसीलिए हमे इसका सबसे ज्यादा कर्ज चुकाना है और हमारी पहली सलामी (नमस्कार)(प्रणाम) इस धरातल को है जिसकी परिक्रमा करते हुए अपने शीश को झुका नतमस्तक हो कर मैं अपने आप को इसका हिस्सा जान रहा हूँ इसने मुझे बनाया है ये मैं मानता हूँ और उसके इस कर्ज को स्वीकारता हूँ


(२) हम सभी जानते है की यह शरीर पांच तत्वों से बना है वो तत्व्  है १-जल २-वायु ३-जमीन(मिटटी)(भूमि) ४-आकाश(शुन्य) ५-अग्नि(आग तेज)

और ये तत्त्व उस एक बूँद में शमाए होते है जिसके बारे में उक्त समझदार व्यक्ति जानते ही है और जो नही जानते है उनके लिए इसका ब्यौरा आगे चल के मैं  दे दूंगा!   ये १ बूँद जब  स्त्री के गर्भाशय में जाता  है तब उसे एक रूप मिलता है ये रूप नर नारी किसी का भी हो सकता है करनी पे आधारित है इस रूप में वह मनुष्य उसी गर्भाशय में ९ माह तक अपने आप को कुंठित कर के सिकुड़ा हुवा दयनीय स्थिति में रहता है और भगवन के वचनो का स्मरण करता है उस वक़्त वह उसी गर्भाशय में परिक्रमा करता हुआ हाथो को जोड़े हुए प्रभु से अपने किये हुए वादो को दुहराता है और प्रभु के  नाम को सर्वस्व मानते हुए बाहर आने की विनंती  करता है इसी बात को यहाँ इस पहली सलाम में बताया गया है जिसमे पृथ्वी वह शरीर है जिसमे मनुष्य ने ९ माह गुजारे और परिक्रमा करते हुए हाथो को जोड़कर विनंती की तब जा कर उसे यह सवा शेर की काया (मनुष्य रूपी अवतार) मिला है

(२)  "बीजी सलाम करू अन्न जल अग्नि जिव्हा डोरी ये जग जगनी
आपनी श्रुष्टि आपने खावे बीजी सलाम करू  मन भावे"

अर्थ

बीजी याने दूसरी सलाम अन्न (खाना)(भोजन)या (भोज्य पदार्थ), जल(पानी), अग्नि (आग) को करता हूँ क्योकि ये तीनो के बिना कोई मनुष्य या कोई भी प्राणी या दूसरे शब्दों में कहे तो कोई भी सजीव इस संसार में नहीं रह सकता है!

यह संसार में भोजन चक्र को यदि देखा जाये तो सभी एक दूसरे के ऊपर जीवित है एक दूसरे को खा रहे है (इसे समझाना या समझना जीतना आसान लगता है उतना है नहीं फिर भी मैं अपनी तरफ से इसके बारे में आप को आगे चल के बताऊंगा )

इस अन्न जल अग्नि को मेरी दूसरी  सलाम समर्पित है!

(३) "त्रिजी सलाम करू त्रिकाला चन्द्रमा भान मोठा महिपाला
 अवे आप श्रुष्टि मा करो अंजुवाला"

अर्थ

त्रिजी याने तीसरी सलाम जो की हम त्रिकाल यानी तीन काल को करते है ये  तीन काल है चन्द्र सूर्य(भान)  महिपाल (राजा या कृष्णा भगवान) यही वह तीन लोग है जिनसे इस श्रुष्टि में उजाला होता है और यह निरंतर रूप से चलती रहती है इसीलिए तीसरी सलाम मैं इन तीनो को करता हूँ

(४) "चौथी सलाम मा चारो खाणी एक बीजक नि जगत बंधानी
अविनाशी पर्चो छे एमा चौथी सलाम नि मोठी महिमा"

अर्थ

यहाँ  शब्द खानी का प्रयोग हुआ है खानी मतलब वह जरिया जिससे किसी सजीव की उत्पत्ति होती है जिसके ४ प्रकार है
(१) इंड (२) पिंड (३)थावर (४)ओसवाल  इसके बारे में मैं आप लोगो को सविस्तार समझाऊंगा आगे चल के
ये चारो से होने वाली उत्पत्ति इस श्रुष्टि को चलती है इसी के आधार पर ये श्रुष्टि टिकी है और सुचारू रूप से  चल रही है चौथी सलाम इन्ही चारो खानियो को  समर्पित है

(५) "पांचवी सलाम करू  पहाड़ वन खण्डी जेने  वेक्ख तापी अने ठंडी
शरीर वेराय सेव काय कीधी पांचवी सलाम रहो सौ रीझि"

अर्थ

पांचवी सलाम पहाड़ वन  भूतल विभाग को जिसने सदियों से पड़ने वाली सर्दी गर्मी और प्रलय को भी देखा है
हर चीज़ को सहन किया है और हमारे लिए अपने आप की परवाह न करते हुए निरंतर हमारी सेवा करते आ रहे है इसीलिए इनकी महत्ता अधिक है और ये हमसे रुष्ट न हो ऐसी प्रार्थना मैं  करता हूँ

(६) “छठी सलाम करू सात सतवाचा सत्कर्म मन अने वचनो ना साचा
सत् चित रहे आनंद एक रंगा छठी सलाम करू गतगंगा"

अर्थ

छठवी सलामी उन सच्चे व्यक्तियों के लिए है जिनकी वाणी निर्मल है जो सच्चे है जिनका मन ध्यान हमेशा सत्कर्मो और धार्मिक प्रसंगो में  लगा रहता है ऐसे लोग गंगा के समान है जिनके पास होने मात्र से हम पवित्र हो जाते है ऐसे व्यक्ति के लिए ही छठी सलाम है

(७) "सातवी सलाम करू शेष ने छेल्ली पृथ्वी ना भार रह्या छे झेली
सकल श्रुष्टि वसे तम माथे सात सलाम करू बेयो हाथे"

अर्थ

सातवी सलाम मैं शेषनाग को करता हूँ जिसने इस पृथ्वी के भार को संभाल के युगो युगो से अपने माथे पे रखा हुआ है ये शेषनाग श्री विष्णु जी के साथ दिखने वाले ही है अतः  इनकी गरिमा कहीं से कम नहीं है !

"दृश्या दृष्टि अलख तू एक ही सात सलाम करू एम देखि
आपनी  सलाम करिष्ये आपे दास सवो सतगुरु माप अमापे"

अर्थ

हर नज़र से नज़ारे से देखा हर जगह देखा अलख हरी तू एक ही है हर जगह है हर किसी में है मुझमे भी है  तुझे अपने रूप में देख के मैं सभी सलाम करता हूँ
अपनी सलाम अपने आप को करता हूँ इस तरह का वर्णन सवा दास अपने सतगुरु को ध्यान में रख के कर रहे है








दास सवा लिखित इस साखी में ज्यादातर पहली सीढ़ी चढ़ने की हर वह तरकीब दिख ही गयी है इसीलिए इस लेख का नाम भी मैंने प्रथम दिया है और सब से पहले अपने लेख में शामिल किया है!

आज हम इस सीढ़ी पे चढ़ने की कोशिश करेंगे उसे कैसे चढ़ना है इस बात को सिखने की कोशिश करेंगे मैं अपने शब्द आप के समक्ष रख रहा हूँ तो इसके पीछे मेरा ध्येय एक ही है की सभी सुखी रहे और सभी में शांति की स्थापना हो!

मोक्ष
बड़ा ही छोटा सा शब्द लगता है लिखने में, बहुत बड़ा सोचने में, असीमित अद्भुत समझने में!
मोक्ष की प्रथम सीढ़ी को आज समझने की कोशिश हम करेंगे!


मैं यहाँ जो लिख रहा हूँ वह मेरे शब्द है, उन्हें और लोगो ने भी लिखा होगा ना नहीं है परन्तु इसे मैंने मेरे हिसाब से मेरी अनुभूति मेरे अनुभव का निचोड़ बन के लिखा है! तो यदि किसी को भी आपत्ति हो तो मुझे कह सकते है!


देखिये ये हम सभी जानते है! किसी भी अध्ययन की प्रथम श्रेणी होती है श्रवण, जी हाँ, सुनना, बिना सुने कोई वस्तु पता कर पाना मुश्किल होता है! सुनना सिर्फ कानो से नहीं होता है! सुनना आँखों से भी होता है! मन से भी होता है! त्वचा से भी होता है! सुनना है तो ये सब आप की एक जगह पे होनी चाहिए! मन भटकते रहेगा, शारीर अस्त व्यस्त रहेगा, आँखे ठिकाने पे नहीं रहेगी तो कानो में पड़ने वाली बात का कोई महत्व नहीं रहेगा उसका कोई असर नहीं होगा! इसीलिए बोलने वाला जब बोल रहा है तब श्रवण की क्रिया सही ढंग से होनी चाहिए, सुनना ही मोक्ष की पहली सीढ़ी चढ़ने का रास्ता है! या जिस तरह से कहिये, जो भी मानिए, सुनना ही ज्ञान का पहला पग है!

बोलने वाले को सुनने वाले के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए और सुनने वाले को भी बोलने वाले के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए तो ही बोले हुए शब्दों का कुछ असर होगा! आज की डेट में क्या हो गया है! more