"नाम" नागेश जय गुरुदेव (दीपक बापू)

मंगलवार, 24 मई 2016

ગગન ગઢ રમવાને હાલો

ગગન ગઢ રમવાને હાલો

ગગન ગઢ રમવાને હાલો, નીરાસી પદમા સદા માલો...ટેક.
પડવે ભાળ પડી તારી,મધ્ય નીરખ્યા મોરારી
વાલમ પર જાવું હુ વારી;ગગન-૧

બીજે બોલે બહુનામી ઘટોઘટ વ્યાપી રહ્યા સ્વામી
જુગતીથી તમે જોઈલો અંતરજામી;ગગન-૨

ત્રિજે તુરાઈ વાજાં વાગે,સુરતા મારી સનસુખ રહી જાગે
માહ સુને મોરલીયું વાગે; ગગન-૩

ચોથે ચંદ્ર ભાણ વાળી જોવે કોઈ આપાપણાને ટાળી
ત્રીવેણી ઉપર નુર લ્યો નીહાળી;ગગન-૪

પાંચમ પવન થંભ ઠેરી, લાગી મુને પ્રેમ તણી લેરી
સુરતા મારી શબ્દુંમા ઘેરી;ગગન-૫

છઠે જોવો સનમુખ દ્વારો ત્રીવેણી ઉપર નાયાનો આરો
ત્યા તો સદા વરસે અમર ધારો;ગગન-૬

સાતમે સમરણ જડયું સાચું આતો કોઈ વીરલા જાણે વાતું
જડયું હવે આદુનું ખાતુ; ગગન ગઢ-૭

આઠમે અકળ કળા એની વાતું હવે ક્યાં જઈ કરુ વ્રેહની
રહું હું તો શબ્દ નીસીમાં ધેની;ગગન ગઢ-૮

નુમે મારે નીરભે થયો નાતો છોડાવ્યો જમપુરીથી જાતો
સતગુરુએ શબ્દ દીધો સાચો;ગગન ગઢ-૯

દશમે જડી દોર તણી ટેકી મધ્યમાં મળ્યા અલખ એકાએકી
સુરતા મારી દંગ પામી દેખી; ગગન ગઢ-૧0

એકાદશી અવીધટ ધાટ એવો શબ્દ લઈને સુરતાને સેવો
સદાય તમે સોહ પુરુષ સેવો; ગગન ગઢ-૧૧

દવાદસી દૂર નથી વાલો સમજ વીના બારે ફરતો ઠાલો
સુખમણ સાથે પી લ્યો અમર પ્યાલો ;ગગન ગઢ-૧૨

તેરસે વાળી ઉપર ઘારા જપુ નીજનામ તણી માળા
પ્રાગટ્યા રવી ઉલટાયા અજવાળું ગગઢ ગઢ-૧૩

ચૌદસે કહ્યુ ચીત કરે નહી મારુ થયું ઓચીંતુ અજવાળું
સતગુરુએ તોડયું વજર તાળું;ગગન ગઢ-૧૪

પુનમે દેખી પુરણ પદ પામી મળ્યા જયારે ફુલગરજી સ્વામી
રહે છે સવો ચરણમાં શીસ નામી; ગગન ગઢ-૧૫



जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
दीपक बापू                 Deepak Bapu                                     દિપક બાપુ



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वह है फ़क़ीर पूरा पारस जुबा हो जिसकी

वह है फ़क़ीर पूरा पारस जुबा हो जिसकी  (सत्तार की ग़ज़ल)
gujrati bhajan lyrics


वह है फ़क़ीर पूरा पारस जुबा हो जिसकी
और हो कदम पदम पे बाके सी अदा हो जिसकी

इश्के खुदा की मस्ती में, मस्त यार होगा
आँखों में तीर होंगे, अबरु कमान हो जिसकी
वह है फ़क़ीर पूरा...

भर देवे एक निगाह से, अक्सीर कर के छोड़े
खोफो खतर न होवे, अयसि शमा हो जिसकी
वह है फ़क़ीर पूरा...

छोटा बड़ा न कोई, उसकी निगाह में होगा
नादान सा दिखे वह, बच्चे सी जान हो जिसकी
वह है फ़क़ीर पूरा...

सत्तार यार होगा, हर बात में वह पूरा
वह ही है मर्द सच्चा, ख्वाहिश फना हो जिसकी
वह है फ़क़ीर पूरा पारस जुबा हो जिसकी

और हो कदम पदम पे बाके सी अदा हो जिसकी


जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
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ગણપતિ બાપ્પા નું થાળ / गणपति बाप्पा नु थाल

ગણપતિ બાપ્પા નું થાળ / गणपति बाप्पा नु थाल

गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया
गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

मंगल मूर्ति मोरया, ने पारवती ना पोरया
मंगल मूर्ति मोरया, ने पारवती ना पोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

हो!! आसो पालव ना दादा तोरण बँधाऊ
मारगढ़े रूढ़ा हु तो फुलड़ा वेराउ
पहरावु फुलड़ा नि माल दादा मोरया
पहरावु मोतिडा नि माल दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

मेवा मिठाई दादा प्रेम थी धरावु!
चूरमा ना लाडू, दादा हेत थी धरावु!
मुयकि छे भावना नि थाल दादा मोरया 
जमा तो कोडिया भरावु दादा मोरया 
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

जल रे जमना नि दादा जाली मैं भरावी 
वहति गंगा नि दादा लोटा भरी लावी
अछमन करावु मारे हाथे दादा मोरया
म्हारे आँखे छे आहूडा नि धार दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

लविंग सोपारी हारे लिली वरियाली
पान केला बिड़ला तमने आपु वारि वारि
मुखवास करावु मारे हाथे दादा मोरया
मुखड़ो करावु लालम लाल दादा मोरया 
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

जेवा तेवा पण सोए अमे तारा
गांडा घेला पण बालूडा तारा
सीताराम मंडल तारा बाल दादा मोरया
जलाराम मंडल तारा बाल दादा मोरया 
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया

गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया
गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया
पाटले पाटले पाटले पाटले पाटले 
पाटले बेहाडु, जमाडु दादा मोरया


जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
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SAWAL PRASHNA QUESTION

शनिवार, 21 मई 2016

Main Nazar se Pee Raha Hoo

Sabar ke Sin ke atkate Sure
Gende Ki Dhaal Raaja Raam Suhaaye
Mrig Ki Khal Odhe Vyaghambar Shiv Shankar Man Ati Bhaave
Haathi Ke Daant Ke Bhaati Bhaati Ke Khilone
Bakri Ki Chaam Pani Bhar Pilvaave
Chet Achet Man Murakh Ye Manushya Ki Khal Kachu Kaam Na Aave

Pashu Ki Paniya Bane!!
Nar Ka Kachu Nahi Hoye
Jo Nar Karni Kare To Nar Se Narayan Hoye



Ki
Main Nazar se Pee Raha hoo
Kahi Shamma Badal Na Jaaye
Na Jhukaao Tum Nigaahe
Kahi Raat Dhal Na Jaaye

Mere Ashk Bhi Hai Isme
Ye Sharaab Ubal Rahi Hai
Mera Jaam Chhune Waale
Tera Hath Jal Na Jaaye

Abhi raat Kuch Hai Baaki
Na naqaab Uthao Saaqi
Tera Rind Girte Girte
Kahin Fir Sambhal Naa jAaye

Mere Zindagi Ke Malik
Mere Dil Pe Haath Rakhna
Tere Aane Ki Khushi Me
Mera Dum Nikal Na Jaaye

Mujhe Phoonkne Se Pehle
Mera Dil Nikaal Lena
Kisi Aur Ki Amanat
Kahi Saath Jal Na Jaaye

Isi Khauf Se Nasheman
Na Ban Saka Main Anwar
Ye Nigaah-e-Ahl-e-Gulshan
Kahi Fir Ujad Na Jaaye


Main Nazar Se Pee raha hoo Kahin Shamma Badal Naa Jaaye


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गुरुवार, 19 मई 2016

गुरु

अब इसके आगे हम गुरु के वखान को अपने शब्दों में उतरने की कोशिश करेंगे
गुरु

गुरु तारो पार न पायो पृथ्वी ना मालिक तमे तारो तो अमे तरिये

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा
गुरु साक्षात् परब्रह्मा! तस्मे श्री गुरुवे नमः!

गुरु बिन कछु उपजे नहीं! भगति वगति को मूल!
रवि कहे पत्थर बोया खेत में! तो आवे नहीं फगुनी फूल!

गुरु गूंगा, गुरु बावरा, गुरु देवन का देव, हुए जो चले में शक्ति तो करे गुरु की सेव!

गुरु मिला तो सब कुछ मिला और न मिलिया कोय!
क्योंकि सूद दारा और लक्ष्मी! ये तो पापी जन के घर में भी होये!

सब धरती कागद करू, लेखनी सब वनराय
पुरे समुद्र की स्याही करू, तोय गुरु गुण लिखा न जाए!

और न जाने क्या क्या कह गए संत लोग और यकीन मानिये इसमें एक भी बाते झूठी नहीं है! हम जितना चाहे उतना लिखते ही जाए मगर गुरु की महिमा आंक नहीं सकते है उसको सिर्फ एहसास में ला सकते है! उसकी अनुभूति कर सकते है! या किसी और के अनुभूति किसी और के अनुभव को सुन भर ही सकते है! माप नहीं सकते है! गुरु के होने की, गुरु के महात्म्य की! कोई ऐसा व्यक्ति इस दुनिया में नहीं होगा जो गुरु के महात्म्य को पूरा पूरा बखान कर दे! कोई ऐसा नहीं कह सकता है की मैं जो कह रहा हूँ गुरु बस उतना ही है! उसके बाहर नहीं! आप के दिमाग की कैपेसिटी! आप की सोच जितनी है! उतना ही आप बोल सकते है! लिख सकते है! मगर गुरु तो उसके पार है! जितना निकलोगे उतना कम ही लगेगा! गुरु आकाश के समान है! अनन्त अपार!

मुझसे जितना हो सकता है संतो के शब्दों उनकी वाणी का सहारा लेके मैं अपने तरफ से आप को अपने सहज शब्दों में साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ पूरा तो नहीं कह सकता हूँ इसको पर मेरी नज़र में जो कुछ है उसमे से कुछ अंश यहाँ रखने की कोशिश कर रहा हूँ!
         
           गुरु! देहधारी गुरु की बात हम यहाँ कर रहे है! गुरु वह परम तत्व है जो सभी तत्वों से परिपूर्ण ही नहीं अपितु उनके भी कई ज्यादा ऊपर है! गुरु कर्मो के ऊपर है! गुरु पांच पच्चीस के पर है! इन सभी के ऊपर उसकी विजय है! बस इतना सा लिखना ही गुरु को हमारी दृष्टि में कहा से कहा ले गया जिसे हम अभी नज़रो में अपने सामने देख रहे थे अब उसके साथ नज़र मिला पाना भी मुश्किल लग रहा है! ये बाते कोई भी गुरुमुखी व्यक्ति सहज ही समझ जाएगा! क्योंकि उसके पास गुरु की अनुभूति है! गुरु के शब्द उसके पास पड़े है! उसकी झोली में गुरु की कृपा भरी पड़ी है! वह झोली खाली नहीं!
 
     गुरु हमारे अनन्त विचारों का एक जवाब है! उसके एक एक शब्द एक एक दृष्टि या कहे की दृष्टान्त हमारे अंदर कितने ही विचारों को जन्मा देती है और उनका समाधान भी करती है! कई प्रकार के बंधनो से गुरु का एक शब्द हमें मुक्ति दे देता है! मुक्त कर देता है! कोई सीमा ही नहीं! गुरु के गुणों की!

      गुरु के लिए एक साधारण सा उदाहरण है! मेरे गुरु "परम पूज्य श्री दीपक बापू" उनकी वाणी के चलते हम उन्हें प्रेम पूर्वक दीपदान भी कहते है! एक बार जब ये सभी बाते मेरे इर्द गिर्द घूम रही थी मैं इनमे उतरता जा रहा था! परम तत्व, पांच पच्चीस, जंगल, शुन्य शिखर, गगन गढ़ क्या है? क्या है परम तत्व? क्या हम इसे देख सकते है? ध्यान क्या है! ये योग है! तो क्या योग में इतनी शक्ति है? क्या ये हमें हमारे मार्ग पे ले जा सकता है? ऐसे ही कई सारे सवाल मेरे दिमाग में चल रहे थे! वाणियों में अजीब अजीब तरह के शब्द, नाद बूँद, गजर, ये सभी मेरे प्रश्नों का हिस्सा बनते जा रहे थे! कुछ तो ऐसे बचकाने प्रश्न होते थे की बोल भी नहीं सकता हूँ! और अपने गुरु श्री दीपक बापू के सामने मैंने तो सवालों की बारिश ही जैसे कर दी हो! इतने सारे सवालो का सिर्फ एक शब्द में जवाब! जो सवाल थे उनको दो भागो में बाँट दिया एक ध्यान से सम्बंधित था! दूसरे बड़े कॉमन क्वेश्चन थे की जिनके लिए उनका होना या नहीं होना! तो उन्होंने इस दूसरे सवाल के लिए सिर्फ इतना ही कहा की कॉमन बातो में कभी क्वेश्चन नहीं होना चाहिए! बात इतनी सी थी मगर मेरे समझ में वह आगयी क्योंकि गुरु जानता है! किसे कैसे समझाना है! अब इस बात का और एक उदाहरण देता हूँ! "केरम" इस खेल से लोग भली भाँती परिचित है! अब खेलने के समय यदि खिलाडी कहे की इसमें काली सफ़ेद गोटिया ही क्यों है! नीली पिली क्यों नहीं कोई और रंग क्यों नहीं? ९ ९ ही क्यों है! ८ या १० क्यों नहीं! लाल गोटी क्यों है! उसकी क्या जरुरत थी! ४ खाने क्यों बने हुए है ज्यादा क्यों नहीं कम क्यों नहीं! किसने इस खेल का निर्माण किया है! किस कमेटी ने इन सभी बातो का निर्णय लिया और उस कमेटी को किसने पारित किया! उसे सही किसने किसने ठहराया पहले ये सभी बातो का खुलासा करो तभी मैं खेलूंगा! तो दोस्तों सीधा सीधा उसको खेल के बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा! क्योंकि खेल का नियम है! जो चला आ रहा है! और ये कॉमन है! कुछ फेरफार होते है! नियम में! मगर सिद्धांत सिद्धांत ही रहने वाला है! और ये सभी बाते कॉमन में आती है! इनके प्रति आप का सवाल बचकाना तो है ही प्लस दूसरों के मजे को भी ख़राब करता है!


            दूसरे शब्दों में ऐसा भी देख सकते है! की कोई गाडी हमें चलानी सीखनी है! तो उसे चलाना ही सीखना चाहिए! ना की उसका इन्वेंशन किसने किया! गियर ब्रेक हैंडल कहा से निकला किसने बनाया! ये सब क्यों है वह क्यों नहीं ये सभी में अगर हम फंसे रहेंगे तो कुछ नहीं कर पाएंगे! और इन बातो की कोई अहमियत उस समय होती भी नहीं है! बाइक चलाने सिखने के लिए बाइक की जरुरत है! जो आप के सामने है! और आप को सीखना है! उसमे क्या वस्तु कहाँ लगी है! और कैसे उसे कंट्रोल करना है! एक बार इतना कर लीजिए बाद में आप को स्वयं किसी और बात की जानकारी का इंटरेस्ट ही नहीं रहेगा! और ये बाते वैसे भी लाखो में कोई एक शायद ही जानता हो! आपको बाइक सीखनी है! तो जो चला रहा है वह आप को बता सकता है! आप उसको ये सभी सवाल करेंगे तो आप जहां थे वही रह जायेंगे! ठीक उसी प्रकार गुरु है! ध्यान की अवस्था! ध्यान कैसे करना वह सब कुछ वह बताता है! वाणी के मरहम को वह समझाता है! वह आपको सही दिशा दिखता है! मगर इस दिशा में इस रस्ते में आप को चलना स्वयं है! वह अपने आपको आप के लिए हमेशा तैयार रखेगा और हर कदम पे आप के साथ ही होगा आप के अंदर ही बैठा रहेगा! जरूरत है आप को अपने विश्वास को बनाए रखने की और सही तरीके से उसकी बातो को मानने की!



         ध्यान अवस्था में निहित गुरु जो ध्यान का सही मतलब और उसको सही तरीके से करना जानता है! वो आप को रास्ता बता सकता है चलने के पहले ही उस ध्यान की क्रिया में कितना टाइम लगेगा ध्यान करने पे नहीं मिला तो क्या करने का? ध्यान में जो प्रकाश दीखता है वह मनगढंत तो नहीं है ये सब कहीं हमारे दिमाग का बनाया हुआ खेल तो नहीं है साइंटिफिक रेअसोंस है इनके पीछे ये सब धोखा है स्वप्न है ये सब सवाल फालतू है कोई अर्थ नहीं है इनका ध्यान लगाओ महसूस करो आपको खुद अनुभूति होगी सच और झूठ का पर्दा उठेगा मगर ज्यादातर लोग इन बातो को हज़म नहीं कर पाते है क्यों की उनके पास गुरु होता नहीं है अगर होता है तो पूरा नहीं होता है क्योकि पूरा गुरु शिष्य के हर बात का जवाब जानता है वह उन हर जगह से गुज़र चूका होता है जहां शिस्य आज चलना चाहता है एक लेवल तक गुरु हर उन सवालो का जवाब दे सकता ही है जहां तक शिष्य को जरुरत है उसके बाद आगे बढ़ना शिष्य का काम है!

               ज्यादातर देखा गया है कई उदाहरण है देखने के लिए जहां शिष्य गुरु से आगे निकल गया मगर क्या इसका मतलब गुरु काम पड़ गया?? नहीं गुरु ने ही कृपा की है!, गुरु ने ही मार्गदर्शन दिया है जिसके कारन वह लोग आज उस मुकाम पर पहुंच पाए है! और यही कारन है की गुरु की महत्ता कभी कम नहीं होती है!..

 १) गुरु तारो पार न पायो, पृथ्वी न मालिक तमे तारो तो अमे तरिये!

                 इन शब्दों को सब से पहले लिखा है मैंने यहाँ पे इसका मतलब देखने में और समझने में बहुत ही साधारण सा लगता है पर यहाँ बात अगर देखि जाए तो त्याग की है अब आप सोचेंगे की त्याग की बात क्या है! किस त्याग की बात हो रही है! एक बार फिर से देखिये "गुरु तारो पार न पायो, पृथ्वी ना मालिक तमे तारो तो अमे तरिये!" वाह क्या बात है!! बास इस एक लाइन की मधुरता, त्याग, समर्पण की भावना! इसको सार में आप को अपने शब्दों में समझाने की कोशिश करता हूँ की गुरु जिसे हमने मान है सिर्फ मान भर लेने से ये या बोल देने भर से हम पूर्ण नहीं होते है इस पंक्ति में पृथ्वी शब्द का प्रयोग हुआ है और संतो की भाषा में पृथ्वी का मतलब होता है शरीर! हमारी देह!, सभी जानते है की संतो में जो भी बाते कही है वह सभी की सभी अपने आप में बेजोड़ है और हमारे शारीर के अंदर ही मौजूद है!इस पंक्ति में भी उन्होंने पृथ्वी शब्द का प्रयोग हमारे शरीर को लेकर ही किया है की गुरु करो तो अपने आप को पूरी तरह से उसके हाथ में सौप दो! पूरी तरह से उसके प्रति सुपुर्द हो जाओ उसे ही अपना मालिक समझ लो! और सभी जानते है की मालिक की हर बात माननी ही पड़ती है तो ठीक वैसे ही उसकी हर बात को मानो, उसके हर एक वचन शब्द को आदेश मानो और पूरा करो! वह ही तुम्हे तारेगा, भव पार उतारेगा!, वह गुणों का भण्डार है, उसके गुणों की कोई संख्या नहीं है, उसमे उदारता की कोई सीमा नहीं है! त्याग में उसके जैसा कोई नहीं है! उसके पार पाना मुश्किल है! उसकी छत्र छाया में ही हमारा उद्धार होगा! हमें कभी किसी वस्तु की कमी महसूस नहीं होगी! छोटे में इतना समझ लीजिए की गुरु नाम की माला ही काफी है आप को ८४ से छुड़ाने के लिए!


2)  गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुसाक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥



 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरुसाक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥

             यह एक संस्कृत में लिखा हुआ श्लोक है जो ज्यादातर तो बच्चे बच्चे के जुबान पर होता है! इस श्लोक में बताया गया है की गुरु की उपाधि कोई वर्णन नहीं है! गुरु ही साक्षात् परमेश्वर का स्वरुप है! इसको थोड़ा हम सार में जानने की कोशिश करते है!
इसको समझने के लिए पहले तो हम इसके सन्धिविच्छेद को समझ लेते है! यहाँ लिखा है! की
गुरु ब्रह्मा
गुरु विष्णु
गुरु महेश
गुरु साक्षात् परब्रह्मा
तस्मै श्री गुरुवे नमः!

ब्रह्मा विष्णु महेश
निर्माता, पालक, संहारक
ये तीनो ही परिपूर्ण देवता है इनके सामान गुरु को माना गया है! इसे थोड़ा और विस्तार से देखते है!

           ब्रह्मा
ब्रह्मा का कार्य है निर्माण करना उन्होंने इस पृथ्वी(धरातल) का निर्माण किया है! और जैसा मैंने ऊपर पहले ही बताया है की संतो ने इस शारीर को भी पृथ्वी ही कहा है! अब ये तो साधारण सी समझने वाली बात है की गुरु ने हमें जन्म तो नहीं दिया है! परन्तु गुरु हमें बनाता है! समाज में हमें अच्छे इंसान के रूप में हमारा निर्माण करता है! हमारे अंदर जो भी बुराई है! उन सभी राग द्वेषो को कांट छांट कर अलग करता है! और हमें पुनः एक घड़े के तरह निर्मित करता है! घड़ा बनाने वाला घड़े को बाहर से अंदर से ठोक ठोक कर सही रूप सही आकार देता है! कई बार उस घड़े को ठोकने पीटने के बाद उसको समतल करने के बाद में तपाता है भट्टी में उसको आग के अंदर! तब जाकर घड़े में गर्मी नहीं बल्कि शीतलता आ जाती है! ये कमाल था उस घड़े बनाने वाले का उसने मिटटी से घड़ा बनाया है! मिटटी को उसने नहीं बनाया उसने मिटटी को रूप दिया और घड़े का निर्माण किया ठीक उसी प्रकार गुरु हमें हमारी बुराई के साथ स्वीकार कर के उन्हें दूर कर के हमारे अंदर शुद्ध मानव का निर्माण करता है इसीलिए उसे ब्रह्मा की उपाधि दी जाती है!

         विष्णु
विष्णु का कार्य है पालन करना! सही रूप से कर्मो को देखते हुए फल को देना! गुरु भी कुछ वैसा ही है! गुरु अपने शिष्य को बुराई से बचाता है! उसे सत्कर्म सत्मार्ग दिखता है! उसपे उसको चलने की प्रेरणा देता है! और न सिर्फ प्रेरणा देता है बल्कि उसका हाथ पकड़ के भी कई बार चलता भी है! पालक की तरह उसमे संस्कार का पुनर्निर्माण करता है! और शिष्य के सही दिशा में आगे बढ़ने पे उसको अपनी योग साधना का फल, अपने ज्ञान का फल वह शिष्य को देता है! इसीलिए गुरु को विष्णु भी कहा जाता है!

            महेश
त्रिमूर्ति में इस मुरी का कार्य है संहार करना! गुरु भी हमारे भीतर बैठे राक्षस का संहार करता है! हमारी बुराई को मारता है! हमारे भीतर बैठे भय को खत्म कर देता है! हमे मुक्ति का मार्ग दिखता है! और हमारी आशाओ को जो की कभी खत्म नहीं होती है! उनका नष्ट कर देता है! और इसी संहार के स्वरूप के कारन गुरु को महेश भी कहा जाता है!

        गुरु साक्षात् परब्रह्मा!
ब्रह्म और परब्रह्म की व्याख्या मैंने पहले भी अपने लेख में की है जिसे आप हमारे ब्लॉग पे देख सकते है! गुरु को परब्रह्म की उपाधि देने का अर्थ यहाँ कुछ इस तरह से आप देख सकते है! की गुरु ही वह व्यक्ति है जो हमें साक्षात् ब्रह्म के दर्शन उनकी उपस्थिति की अनुभूति हमें करवाता है! गुरु हमारे अंदर से मैं और मेरा निकाल कर समदृष्टि सद्भावना का निर्माण करता है! हमारे अंदर जो ब्रह्म का तत्व खेल कर रहा है! उसका सही स्वरुप दिखा कर के ब्रह्म से भी पर परब्रह्म जहां हम सभी को अंत में मिल जाना ही लक्ष्य है उसका मेल करा देता है! गुरु हमारे अंदर उस परब्रह्म की छवि का आभास करा देता है! अब जो आप को उसकी छवि का आभास करा दे रहा है! आप उसे स्वयं क्या समझेंगे!???



           ३) गुरु बिन कछु उपजे नहीं! भगति वगति को मूल!
रवि कहे पत्थर बोया खेत में! तो आवे नहीं फगुनी फूल!
         गुरु बिन कछु उपजे नहीं! भगति वगति को मूल, रवि कहे पत्थर बोया खेत में! तो आवे नहीं फगुनी फूल! इस  पंक्ति  में  गुरु   की  महत्ता  को  दर्शाया  गया  है  की  व्यक्ति  के  जीवन  में  गुरु   का  कितना  महत्त्व  होता  है! गुरु  के  बिना  ना  ही  भक्ति  पूरी  हो  पाती  है  न ही  मुक्ति  हो  पाती है  क्योकि  गुरु  ही  मार्गदर्शन  करता  है  इन सभी  बातो  में, उसके  द्वारा  दिखाया  गया  रास्ता  ही  अपने  को  सही  मंज़िल  तक  पहुंचता  है! प्रस्तुत  साखी  श्री  रवि   साहब  की  है  जिसमे  उन्होंने  अपने  शब्दों में गुरु की महत्ता को बताया है गुरु के बिना रहना ठीक उसी प्रकार है जैसे पथर को खेत में बोने के बाद किसी प्रका के फसल की आशा करना क्योंकि खेत में यदि पथ्थर बोये है तो उसमे से कोई फल नहीं निकलने वाला है! गुरु करने पे गुरु हमारे अंदर उस बीज को, उसकी साधना को, उसके योग के फलित बिज को दाल देता है! जिसके कारण हमारे अंदर भी उन फलों का निर्माण होता है! इसको सही ढंग से देखा जाए तो कुछ ऐसा है की गुरु हमारे हमारे जैसे पथ्थर को भी सही बीज में रूपांतरित कर देता है! इसीलिए गुरु के बिना कुछ भी संभव नहीं है! अतएव गुरु करना बहुत जरुरी है!

४) गुरु गूंगा, गुरु बावरा, गुरु देवन का देव, हुए जो चले में शक्ति तो करे गुरु की सेव!

यहाँ पे प्रस्तुत पंक्ति में चले की परीक्षा ऐसा कुछ ही समझ लो इन्हे मैंने मेरे शब्दों में ही समझाने की कोशिश की है इसीलिए अगर किसीको कोई बात गलत लगे तो कृपया करके मुझे मैसेज कमेंट करे ताकि मैं उसमे सुधर ला सकु... हाँ तो! बात ऐसी है की गुरु किसी विषय में कुछ जल्दी बोलता नहीं है, वह अपने आप में एक मदमस्त हाथी जैसा ही होता है एक नशे में झूमता हुआ व्यक्ति आप ने देखा होगा वह अपनी मस्ती में होता है जब तक उसके आगे आप न जाओ या उसे ना टोको तब तक वह अपने आप में ही होगा उसको टोकने के बाद में भी टोकने वाले की क्षमता (capacity) पे डिपेंड करता है की वह व्यक्ति टोकने वाले को जवाब देगा या अपनी मस्ती में रहेगा;, शामे सिचुएशन गुरु की भी होती है "देवन के देव" या कह सकते है की देवो के देव जो की हम सभी जानते है "महादेव" है और इस बारे में किसीको बताने की आवश्यकता तो नहीं है की देवो के देव महादेव कैसे है मदमस्त अपनी दुनिया में मशगूल समाधी में रमते हुए चौदह लोक की खबर रखते हुए, भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता इतना होते हुए भी निर्भीक, बेफिक्रे बन के अपनी अवस्था में ही रहते है और तब तक उस अवस्था को विश्राम नहीं देते जब तक कोई पात्र उनके सामने ना आये...
ठीक उसी तरह गुरु देव भी अपने आप में ही होते है और जब तक कोई सुपात्र चेला उनके समक्ष अपने आप को नहीं रखता है, नहीं साबित करता है तब तक उनके भी ज्ञान का पिटारा नहीं खुलता है और जब चला अपनी शक्ति(सामर्थ्य) से गुरु को रिझाने में कामयाब हो जाता है तो उस चले को सही ज्ञान, मार्गदर्शन, गुरु से प्राप्त होता है!

 गुरु की महिमा का वर्णन कर पाना सही में बहुत मुश्किल है फिर भी मुझसे जितना हो पा रहा है! मैं अपनी तरफ से उसको यहाँ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ और इस विषय में हम आगे भी अपने आप को रखते रहेंगे! क्योंकि गुरु आकाश के सामान है अंत नहीं अनन्त है!

जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
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SAWAL PRASHNA QUESTION

सवाल प्रश्न क्वेश्चन

सवाल ****प्रश्न ****क्वेश्चन 

"सवाल अपने आप से" "प्रश्न अपने आप से" "QUESTION TO YOURSELF"
जी हाँ अपने आप से एक बार तो सभी, अपने आप से ये पूछते ही है, हर व्यक्ति अपने आप से सवाल तो करता ही है! और जवाब की खोज में लग जाता है! अक्सर ये सवाल हम अपने आप से तब पूछते है जब कुछ बुरा होता है या तो जब हमारी आशा की विपरीत कोई काम होता है! या तो जब हम कोई नया काम स्टार्ट करते है तब हम अपने आप से एक बार तो सवाल करते ही है! और हक़ीक़त में देखा जाये तो ये अच्छी बात है! परन्तु क्या सिर्फ यही तक इसको रखना ठीक है???   गौर करने वाली बात ये है की सवाल पूछना वह भी अपने आप से ये बहुत बड़ी ज्ञानी की निशानी है! ये बात हम सभी जानते है! इसको मानते भी है! तो जब हम ये जानते है! तो हम इसे अपनाते क्यों नहीं है! क्यों कुछ भी करने के पहले हम एक बार अपने आप से सवाल करने में कतराते है! काफी सारे डिसीजन्स बिना सोच विचार के ले लेते है! और जब हम ऐसा करते है तो १० में से ८ बार गलती का शिकार होते है! जो २ बार बच जाते है वह भी बचते नहीं है! बस थोड़ा रास्ता लम्बा कटता है और आगे चल के औंधे मुँह गिरते ही है!
         सवाल!  इसे अपने आप से करना चाहिए ही चाहिए!  सवाल के बारे में एक बात सुनी थी की जो सामने है वह सवाल है और जो उसके पीछे है वह जवाब है!   बात को प्रैक्टिकली भी ले सकते है! और सोच सकते है! विचार कर सकते है!!! कई बार लोग सवाल पूछने वाले को बेवक़ूफ़ समझते है! परन्तु ये बात तो हम सभी जानते है! की सवाल पूछने वाला सिर्फ सवाल पूछने भर के लिए बेवकूफ रहता है! एक बार उसने सवाल कर दिया और उसको जवाब मिल गया तो वह तो पूर्ण हो जाता है! परन्तु जो लोग उसको नादान मानते थे वह हमेशा के लिए नादान ही रह जाते है!

        सवाल! ना जाने कई सारे अविष्कारों का जन्मदाता है ये सवाल या यूँ भी कह सकते है! की सभी अविष्कारों का जन्मदाता सवाल ही है! सोच के देखिये!  किसी ने अपने आप से सवाल किया की ये धरती कैसी है? तो जवाब आया और उसकी पुष्टि हुई! कैसी दिखती है? तो जवाब आया और आविष्कार होने लगे! हर बार जरुरत सवाल बन के खड़ी होती गयी और मानव ने जवाब के रूप में अविष्कार को जन्म दिया! तो सवाल की अहमियत आप समझ ही रहे होंगे की सवाल क्या से क्या कर सकता है!

      सवाल! एक बार एक राजा था जो हर काम अपनी मर्जी से करता था! अब राजा था तो हर काम मर्जी से ही करेगा! आप कहेंगे इसमें बड़ी बात क्या है! तो बड़ी बात ऐसी है की वह काम की सलाह मशविरा किसी भी अपने मंत्री या सलाहकार या किसी भी अनुभवी व्यक्ति के बिना ही करता था! और इसी कारन ज्यादातर उसके क्रियान्वित कार्य समय से पहले ही बंद पड़ जाते थे! कोई भी काम अपने अंत तक नहीं पहुंच पाता था! और हैरत करने वाली बात ऐसी की राजा इस बात को ना ही सभा में रखता ना ही किसी और से डिसकस करता! दिन बीतते जा रहे थे! राज्य की हालत ख़राब थी! राजा कुछ समझ नहीं पा रहा था! अकेले ही अकेले घूंट रहा था! ऐसा नहीं था की उसे अपनी प्रजा की चिंता नहीं थी ! परन्तु वह अपने आपको सर्वोच्च मानता था! उसकी नज़र में कोई उसके जैसा था ही नहीं जिसके साथ बात कर के वह कोई रास्ता निकाल सके!
       
            कुछ दिन बाद वहा एक संत का आना हुआ! और संत के बारे में तो क्या कहने! कहते है! संत जिस भूमि पे अपने कदम रख दे वह भूमि पवित्र हो जाती है! कुछ ऐसा ही यहाँ भी होने वाला था! राजन से मिलने की इच्छा संत को हुयी! क्योंकि उसने राज्य की हालत देखि! लोग बिना काम के पड़े हुए है! रास्तो की हालत ख़राब है! झगडे चोरी फसाद सभी तरह के राज्य देश के अहित के कार्य भली भाँती फल फूल रहे थे! संत ने महल की तरफ रुख किया! और राजा से मिलने जा पहुंचा! राजा ने सही तरीके से अतिथि धर्म को  निभाया! ये देख संत ने राजा से कहा! की क्या मैं आप से कुछ बोल सकता हूँ???  राजा ने सोचा की ये फ़क़ीर मुझे क्या बोलेगा खाने आया है! खिला तो दिया है! अब क्या रहने के लिए ज़मीन मांगेगा! या कुटिया बनवा के देने के लिए कहेगा! चलो कोई बात नहीं! कम से कम सुन तो ले की ये कहता क्या है! और राजा ने संत को बोलने के लिए कहा! संत ने उसे तुरंत सिर्फ इतना ही कहा! की हे राजन! जो अभी तुमने अपने मन में किया बस इसी को करो तुम्हारा काम हो जायेगा! राजन तनिक विचार किया और संत की बात को समझ गया की संत के एक शब्द ने उसके मन में सवाल खड़े कर दिए और जवाब की चाह में जब उसने संत को मौका दिया बोलने का तब उसे संत ने उसकी गलती का एहसास दिल दिया की जो कुछ होता है! उसे अपने आप में दबा के रखना गलत है! उसको जाहिर होने दो! सवाल करने जरुरी है! सवाल नहीं होंगे तो  किसी के पास यदि जवाब होगा तो भी नहीं मिलेगा! क्योंकि हमने सवाल किया है ही नहीं! बस फिर क्या था! राजा ने दरबार में अपने सभी मंत्रियो सलाहकारों, अनुभवियों को बुलाया! और हालत से अवगत कराया और सलाह की! सभी खुश हुए! क्योंकि सभी जानते थे पर राजा के सामने किसकी हिम्मत हो कुछ बोलने की! काश उन्होंने भी सवाल किया होता! तो राज्य की दुर्दशा नहीं होती! पर कोई बात नहीं! कहते है! देर है पर अंधेर नहीं! शायद ये उनकी होनी में था जो हुआ और समय से संत के मार्गदर्शन के कारन वह अपने सही रास्ते पे आ सके!

    खैर राजा को तो समय मिल गया अपनी भूल सुधारने का पर ज्यादातर लोगो को नहीं मिल पाता है! जिसके कारन लोग अजीब अजीब तरह के दलदल में धंसते चले जाते है! चारो तरफ से अपने आप को अकेला ही पाते है! मैंने पहले भी कहा था! अपने लेख में की यदि कुछ अंदर भरा पड़ा है! तो उसे एक्सप्रेस करो! किसी भी तरीके से! क्योंकि आप यदि अपने अंदर ज्वालामुखी लेके चलेंगे तो वह एक दिन फटेगा ही फटेगा! और कही इस ज्वालामुखी के चपेट में आप के अपने ना जाए इसीलिए समय रहते इस ज्वालामुखी को शांत करना बहुत ज़रुरी है!

सवाल की जरुरत जीवन में इतनी है की उसके बिना जीवन ही नहीं लगता है! सवाल के बिना कोई वस्तु का अस्तित्व नहीं लगता है! सवाल अपने आप से करना भी बहुत जरुरी है! और दूसरों से भी करना जरुरी है!प्रश्न  के बारे में ऐसी कई बात है जिन्हे समझना जरुरी है! प्रश्न का निर्माण क्यों होता है इसका मूल क्या है! यह जानने की कोशिश थोड़ी हम करेंगे! प्रश्न हमेशा जवाब के साथ ही होता है! उदाहरण के तौर पे जब बालक का जन्म होता है! तो पूछते है! की लड़का हुआ या लड़की? ये प्रश्न है! और जवाब पीछे पीछे चला आता है! देखा जाए तो उत्पत्ति से ही प्रश्न शुरू हो जाते है! आप की पहली सांस पृथ्वी पे लेने के साथ ही आँखे खुलते ही अचंभित सी दिखती है! वाणी नहीं होने के कारन आप के सवाल आप के रुदन में आप की आँखों में दीखते है! छोटी सी उम्र में ही आप सवाल शुरू कर देते है! और जब तक आप की साँसे चल रही है! तब तक आप सवाल करते ही रहते है! गूंगा हो बहरा हो या किसी भी प्रकार से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो पर सवाल के दायरे से बाहर नहीं होता है! परन्तु अक्सर हम सवाल जो हमारी ज़िन्दगी हमारे मोक्ष से रिलेटेड है हम उन्हें नहीं करते है! आध्यात्मिक रूप से धर्म के नाम पे यदि हमारे धर्मगुरु कोई बात कहते है तो हम आँख मूँद के उसको करने लग जाते है! सवाल नहीं करते है! कुछ दिन पहले एक इंसिडेंट नज़रो में आया! एक गुरुमुखी महानुभाव धूम्रपान से सख्त नफरत करने लग गए जब की धुआँ उड़ाना तो उनकी शान होती थी! मगर उनकी नफरत देख के उनके विचार सुन के मुझे भी बड़ा अच्छा लगा की चलो इनमे इतना बड़ा फरक गुरु के कारण आ गया! ये देख के मुझे भी तनिक विचार करने पे मजबूर होना पड़ा पर ये वस्तु ज्यादा दिन तक देखने नहीं! मिली !  कुछ दिन बाद ही मैंने उन्हें उनके गुरु महाराज के साथ धुंए का छल्ला उड़ाते देखा! मुझसे रहा नहीं गया मैंने पूछ ही लिया की ऐसा क्यों तो उन्होंने कहां की जिसने छुड़ाया था उसीने दोबारा पीने के लिए कहा है! अब समझने  वाली ये बात है की ऐसा क्यों हुआ! और ऐसे को क्या समझेंगे! इसमें कहीं कोई गलती है या नहीं! अगर गलती है तो किसकी है! और क्यों है! क्यों उस व्यक्ति ने अपने गुरु से सवाल नहीं किया की जब आप ने मुझे छोड़ने के लिए कहा था तो आज दोबारा आप ही खुद मुझे क्यों ये पकड़ा रहे है!क्या कारन है इसका! मगर नहीं उसने नहीं पूछा क्योंकि उसका काम होने लगा था उसे नशे में रहने की लत थी और उसके गुरु ने उसे दुबारा उस नशे को करने की आज्ञा दे दी थी! काश जब  छोड़ने के लिए गुरु ने बोला था तब एक सवाल कर लिया होता की क्यों छोड़ू तो उसे गुरु अच्छी तरह से समझाते की उसके कारन क्या हो सकता है! पर उसने नहीं पूछा और जब गुरु ने दुबारा पकड़ने बोला तभी भी उसने नहीं  पूछा की क्यों मुझे पुनः वही काम करने के लिए कह रहे है! गुरु की सोच कुछ अच्छी होती तो वह बाहर आती और दृश्य कुछ और होता और अगर गुरु के पास कोई जवाब नहीं होता तो सीधा सीधा मतलब था इसका की वाणी और वर्तन में फेर है! ऐसे धोखे से सावधान! परन्तु ये सब व्यक्ति करता ही नहीं है! आदमी आज कल पूरी तरह मतलबी हो चूका है! जब तक उसका काम बन रहा है! उसकी मौज चल रही है! तब तक वह किसी से भी कोई भी सवाल नहीं करता है! मगर जब उसकी पूछ दबती है! तब बराबर हर सवाल जवाब शुरू हो जाते है! तब आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है! ऐसे में देरी बहुत हो जाती है! और आप अपना बहुत बड़ा नुक्सान कर बैठे होते है!

सवाल ज़िन्दगी से


सवाल ज़िन्दगी से
       आखिर क्या सवाल हो सकते है जो ज़िन्दगी से पूछने है? क्या हो सकता है! ज़िन्दगी से संबंद्धित जो हम अज्ञानी बन गए है! सब कुछ तो हम कर ही रहे है तो ऐसा क्या छूट गया जिसके लिए आज हम इस बात को दुहरा रहे है? क्या हमने कुछ गलत किया है?, क्या हमने कोई वस्तु पीछे छोड़ दी है?  !! जी हाँ हमने अपनी ज़िन्दगी में जो करना चाहिए था वह नहीं किया और अगर किया तो भी उसे कोई मान्यता नहीं दी है! हमने बहुत कुछ अपनी जीवन काल में पीछे छोड़ दिया है!, बहुत से सवाल ऐसे है जो हमने अपने आप से किये ही नहीं है और किये है तो भी उसके प्रति कोई भी संज्ञान हमने नहीं लिया! कोई विचार के घोड़े हमने उस मैदान में दौड़ाए ही नहीं! उस ऊबड़ खाबड़ ज़मीन को हमने ज्यों का त्यों ही रहने दिया उसमे कोई भी हल चलाना हमने अपनी जिम्मेवारी समझी ही नहीं!

विस्तार तौर पे लिखने या बोलने जाऊं तो शायद सब कुछ कम पड जाए इसीलिए यहाँ कुछ मुख्य सवालों को सहविस्तार समझाने की कोशिश कर रहा हूँ!

ये सवाल निज से जुड़े हुए है अपने आप से ही
मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ, मैं क्यों हूँ?
   जवाब:  मैं कौन हूँ ये हाथ मेरा हाथ है मैं नहीं, ये पैर मेरा पैर है मैं नहीं, ये सब कुछ पूरा का पूरा शरीर मेरा है मेरे भाग है जो मुझ से जुड़े है पर ये सब कुछ मैं नहीं हूँ, मेरा नाम मेरा है पर वह भी मैं नहीं हूँ तो मैं कौन हूँ, मैं ????   जवाब एकदम सरल सहज और सर्वमान्य है की मैं मैं ही हूँ जो मुझमे बैठा है, जो इस पांच तत्वों से बने तीन गुण पच्चीस प्रकृति से रहित इस देह को चला रहा है! हर वस्तु का ज्ञान करा रहा है! वह तो मुझमे अंदर ही बसा है और वह ही मैं हूँ,
   कई जगह पे आध्यात्मिक, धार्मिक स्थलों में हमने देखा सुना है वह मनुष्य को आत्मा कहते है! और ये सही बात है! पर आत्मा अपने आप को कह भर देना और मान लेना दोनों में बहुत फेर है! कितनी जगहों में तो इसे रट्टा मार के याद कराते है की आप आत्मा है! आप भगवान का अंश है! आप स्वयं भगवान् है! पर क्या ये सही है! इससे उस व्यक्ति में फरक पड़ता है?? नहीं! बिलकुल नहीं वह उस जगह को छोड़ते ही दुबारा अपने विचारों को वही त्याग देता है!
ऐसा क्यों?
क्योंकि इसे समझना इतना आसान नहीं  है मेरे भाई, हम सभी इन बातो को जानते है! पर एक्सेप्ट करना बहुत मुश्किल है! तो पहले अपने आप को जानो, सही तरीके से जानो, इसके लिए आप को एक चटके की जरुरत है! किसी देह धारी गुरु की जरुरत है जो आप के आतम-गुरु को जगा सके! मैं आत्मा हूँ मैं इश्वर का अंश होते हए स्वयं ईश्वर हूँ, और मैं हूँ तो जो भी इस धरति पर है वह भी ईश्वर ही है! और सभी के साथ प्रीति का व्यवहार ही रखना मेरा प्रथम धर्म है! सत्य प्रेम करुणा सिर्फ बातो में नहीं व्यवहार में भी! और यदि मैं यह करता हूँ तो ही "मैं" हूँ वर्ना मैं तो था भी नहीं और हूँ भी नहीं!











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बुधवार, 18 मई 2016

માડી રે મ્હારા મોઘેરા મેહમાન થાળ

માડી રે મ્હારા મોઘેરા મેહમાન
કરું પ્રેમે હું સમ્માન, કે જમવા આવો ને (2)

આસો રે પાલવ ના તોરણ બંધાવું,
ફૂલડાં વેરાઉં તારી વાટ (2)

પેહેરાવું તને ફૂલડાં ની માળા, હે માં...
પેહેરાવું તને ફૂલડાં ની માળા
તમે વેલ્લા આવો આજ કે જમવા આવો ને!
માડી રે.....

મેવા રે મીઠાઈ ઘણા ભાવ થી ધરાઉં
બરફી ને પેંડા માત.(2)
ધર્યો છે મૈ તો ભાવના ની થાળ, હે માં....
ધર્યો છે મૈ તો ભાવના ની થાળ
કે લાયી ચોસઠ જોગણી ને સાથ  કે જમવા આવો ને!
માડી રે.....

જળ જમના ની જાળીયુ ભરાવું
નીર રે ગંગા નાં થાળ(2)
આંખે છે મ્હારે આહુદા ની ધારા, હે માં....
આંખે છે મ્હારે આહુદા ની ધારા
અછ્મન કરવા કાજ, તમે આવોને 
માડી રે.....

લવિંગ સુપારી પ્રેમે ધરાવું 
પાન કેલા બિડલા સાથ 
મુખવાસ કરજો મારે હાથે મારી માડી, હે માં...
મુખવાસ કરજો મારે હાથે મારી માડી
પૂરી કરજો આસ કે જમવા આવો ને,
માડી રે...

જેવા ને સેવા પણ સોયે અમે તારા
ગાંડા ઘેલા તારા બાળ (2)
જલારામ મંડળ બાળ તમારા, હે માં....
જલારામ મંડળ બાળ તમારા
પ્રેમે ધરજો હાથ કી જમવા કી આવો ને 

માડી રે મ્હારા મોઘેરા મેહમાન
કરું પ્રેમે હું સમ્માન, કે જમવા આવો ને (2)



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शनिवार, 14 मई 2016

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