"नाम" नागेश जय गुरुदेव (दीपक बापू)

शुक्रवार, 3 जून 2016

નાઝિર સાહેબની થોડીક ગઝલો

ખુશી દેજે જમાનાને, મને હરદમ રુદન દેજે
ખુશી દેજે જમાનાને, મને હરદમ રુદન દેજે

અવરને આપજે ગુલશન, મને વેરાન વન દેજે..

સદાય દુખ માં મલકે, મને એવા સ્વજન દેજે,

ખીજા માં પણ ના કરમાય, મને એવા સુમન દેજે.(૧)

જમાનાના બધા પુણ્યો જમાનાને મુબારક હો,
હું પરખું પાપને કાયમ, મને એવા નયન દેજે... (૨)
હું મુક્તિ કેરો ચાહક છું, મને બંધન નથી ગમતા,
કમળ બિડાય તે પેહલા , ભ્રમરને ઉડ્ડયન દેજે. (૩)

સ્વમાની છું, કદી વિણ આવકારે ત્યાં નહીં આવું,
અગર તું દઈ શકે મુજને તો ધરતી પર ગગન દેજે.(૪)

ખુદા આ આટલી તુજને વિનતી છે આ ‘નાઝિર’ની,
રહે જેનાથી અણનમ શીશ, મને એવા નમન દેજે. (૫)


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khushi deje jamana ne, mane hardam rudan deje.
avar ne aapaje gulsan, mane veran van deje.

saday dukh ma malake mane eva swajan deje,
khinja ma pan na karmay mane eva suman deje.

jamana na badhay punyo jamana ne Mubarak ho:
hu parkhu pap ne mara, mane eva nayan deje.


hu mukti kero chahak chhu, mane bandhan nathi gamta,
kamal biday te pahela, bramar ne uddayan deje.

swamani chhu, kadi vin aavkareye tya nahi aavu:
agar tu dai sake mujane to dharti par gagan deje.

khuda ya! aatali tujane vinanti chhe aa "NAZIR" ni:
rahe jena thi ananam shish mujane e naman deje.



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ગગનવાસી ધરા પર બે ઘડી શ્વાસો ભરી તો જો.
જીવનદાતા, જીવનકેરો અનુભવ તું કરી તો જો.

સદાયે શેષશૈયા પર શયન કરનાર ઓ, ભગવન !
ફકત એક વાર કાંટાની પથારી પાથરી તો જો.

જીવન જેવું જીવન, તુજ હાથમાં સુપરત કરી દેશું
અમારી જેમ અમને એક પળ તું કરગરી તો જો.

નથી આ વાત સાગરની,આ ભવસાગરની વાતો છે;
અવરને તારનારા!તું સ્વયં એને તરી તો જો!

નિછાવર થઇ જઇશ, એ વાત કરવી સહેલ છે ‘નાઝીર’
વફાના શ્વાસ ભરનારા, મરણ પહેલાં મરી તો જો.

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Gaganwaasi dharaa par be ghadi swaaso bhari to jo.
Jeevan daata Jeevan kero anubhav tu kari to jo...

Sada ae shesh saiya par shayan karnaar oh bhagwant,
fakat ek vaar kanta ni pathaari paathri to jo...

Jeevan daata Jeevan kero anubhav tu kari to jo.
Gaganwaasi dharaa par be ghadi swaaso bhari to jo...

Jeevan jevu Jeevan tuj haath maa suparat kari deshu,
Amaari jem amne ek pal tu kargari to jo.

Jeevan daata Jeevan kero anubhav tu kari to jo.
Gaganwaasi dharaa par be ghadi swaaso bhari to jo...

Nichhavar thayi jayish ae vaat karvi sahel chhe "Naazir"
Wafaa naa swaas bharnaara maran pehla maro to jo.

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પ્રભુના શીશ પર મારું સદન થઇ જાય તો સારું ; ભલે ગંગા સમું એ મુજ પતન થઇ જાય તો સારું.
નહીં તો  દિલ-બળેલો ક્યાંક બાળી દે નહીં જગને ; પતંગાને શમા કેરું મિલન થઇ જાય તો સારું.
એ અધવચથી જ મારાં દ્વાર પર પાછા ફરી આવે ; જો એવું માર્ગમાં કંઇ અપશુકન થઇ જાય તો સારું.
નહીં તો આ મિલનની પળ મને પાગલ કરી દેશે ; હ્રદય ઉછાંછળું છે જો સહન થઈ જાય તો સારું.    
જીવન ભર સાથ દેનારા ! છે ઇચ્છા આખરી મારી ; દફન તારે જ હાથે તન-બદન થઈ જાય તો સારું.
વગર મોતે મરી જાશે આ ’નાઝિર’ હર્ષનો માર્યો ; ખુશી કેરું ય જો થોડું રૂદન થઇ જાય તો સારું.
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તમે બોલાવશો એને તો મારું કામ થઇ જાશે ; વિના ઉપચાર આ બીમારને આરામ થઇ જાશે.
પછી મંદિર કે મસ્જિદ, જે ગણું તે ઘર હશે મારું ; કદમથી  આપના મુજ દ્વાર તીરથધામ થઇ જાશે.
નિછાવર થઇ જનારા ! આટલો તો ખ્યાલ કરવો’તો ; જગતમાં રૂપવાળાઓ બધે બદનામ થઇ જાશે.
દયાળુ ! દાન જો દેવું ઘટે તો પાત્રને દેજો ; નહીં તો કંઇક આ ’નાઝિર’ સમા બેફામ થઇ જાશે.

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 રૂપાળા દેહમાં આતમનું પણ હોવું જરૂરી છે ; મનોહર ફુલ છે, ફોરમનું પણ હોવું જરૂરી છે.
કહાવો છો દયાળુ ને દયાની છાંટ પણ ક્યાં છે ? આ ખાલી કૂપમાં ઝમઝમનું પણ હોવું જરૂરી છે.
ભલેને ડૂબીએ પણ તાગ સાગરનો લઇ લેશું ; અરે ઝંપલાવ દિલ ! જોખમનું પણ હોવું જરૂરી છે.
નિહાળો ના, આ ફાટી આંખથી સૌંદર્યને ’નાઝિર’ ; પરમ દર્શન સમે સંયમનું પણ હોવું જરૂરી છે.

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પથીક તું ચેતજે, પથના સહારા પણ દગો દેશે; ધરીને રૂપ મંઝિલનું, ઉતારા પણ દગો દેશે.
મને મજબૂર ના કરશો, નહીં વિશ્વાસ હું લાવું; અમારાના અનુભવ છે,તમારા પણ દગો દેશે.
હું જાણું છું છતાં નિશદિન લૂંટાવા જાઉં છું ’નાઝિર’ શિકાયત ક્યાં રહી કે આ લૂંટારા પણ દગો દેશે.
આ જવાની, જિંદગાની ચાર દિન
             ગમ વ્યથાને શામદાની ચાર દિન
                        મોત ટાણે એકલો મૂકી જશે
                                       એ બધી વાતો વફાની ચાર દિન
                                                 નામ ’નાઝિર’ કોઇના રહ્યાં નથી
                                                         તુજ કવન-યાદી થવાની ચાર દિન
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ખ્વાઝા ગરીબ પરવર કહકર બુલા રહા હૂં

ખ્વાઝા ગરીબ પરવર કહકર બુલા રહા હૂં
રૂઠે હુયે પીયુ કો કબ સે મના રહા હૂં!
દૌડો ઈમાન વાળો ખ્વાઝા જી રૂઠ બૈઠે
તુમ ભી મનાઓ આકર મૈ ભી મના રહા હૂં!
જલ જલકર દિલ હુઆ હૈ મીસ્લે કબાબ મેરા
દિલ તો જલા દિયા હૈ! તન ભી જલા રહા હૂં!
લીલ્લાહ નિગાહે તીરછી હોવે ઇધર કો પ્યારે
મેરી તરફ તો દેખો આંસુ બહા રહા હૂં!
સત્તાર બનકર બૈઠું, ઇતની કહા હૈ તાકાત
દીના બનકર અબ તો આંખે ગડા રહા હૂં!

मंगलवार, 31 मई 2016

थोड़ी सी ज्ञान की बात भाग ४

थोड़ी सी ज्ञान की बात भाग ४


मोक्ष
बड़ा ही छोटा सा शब्द लगता है लिखने में, बहुत बड़ा सोचने में, असीमित अद्भुत समझने में!
मोक्ष की प्रथम सीढ़ी को आज समझने की कोशिश हम करेंगे!

मैं यहाँ जो लिख रहा हूँ वह मेरे शब्द है, उन्हें और लोगो ने भी लिखा होगा ना नहीं है परन्तु इसे मैंने मेरे हिसाब से मेरी अनुभूति मेरे अनुभव का निचोड़ बन के लिखा है! तो यदि किसी को भी आपत्ति हो तो मुझे कह सकते है!


देखिये ये हम सभी जानते है! किसी भी अध्ययन की प्रथम श्रेणी होती है श्रवण, जी हाँ, सुनना, बिना सुने कोई वस्तु पता कर पाना मुश्किल होता है! सुनना सिर्फ कानो से नहीं होता है! सुनना आँखों से भी होता है! मन से भी होता है! त्वचा से भी होता है! सुनना है तो ये सब आप की एक जगह पे होनी चाहिए! मन भटकते रहेगा, शरीर अस्त व्यस्त रहेगा, आँखे ठिकाने पे नहीं रहेगी तो कानो में पड़ने वाली बात का कोई महत्व नहीं रहेगा उसका कोई असर नहीं होगा! इसीलिए बोलने वाला जब बोल रहा है तब श्रवण की क्रिया सही ढंग से होनी चाहिए, सुनना ही मोक्ष की पहली सीढ़ी चढ़ने का रास्ता है! या जिस तरह से कहिये, जो भी मानिए, सुनना ही ज्ञान का पहला पग है!

बोलने वाले को सुनने वाले के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए और सुनने वाले को भी बोलने वाले के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए तो ही बोले हुए शब्दों का कुछ असर होगा! आज की डेट में क्या हो गया है! की बोलने वाला बोलता रहता है! सुनने वाला सिर्फ कान इस बात पे लगाता है की कब बोलने वाला कोई गलती करे और ये हमला कर देवे, और यही आज कल चल भी रहा है! मैं नहीं कहता हूँ की ये गलत है या सही है! हर किसी का अपना नज़रिया है! हर किसी के पास अपना तर्क है! मेरा सोचना जिस बारे में जैसा है वैसा हर किसी का हो ऐसा जरुरी नहीं है! परन्तु सिद्धांत कभी गलत नहीं होते है! धर्म कभी गलत नहीं होता है! वेद, शस्त्र, धर्म ग्रन्थ इन सभी किताबो को यदि पढ़ ले और सोचे तो एक छोटा सा सार अगर देखना हो तो यही है की सभी के साथ प्रेम करो, जीव दया रखो, और निज धर्म का पालन करो

तो जैसे की सुनना ही प्रथम सीढ़ी है! आप खुद सोच के देखिये छोटे से बच्चे हो या बड़े बुजुर्ग बिना कुछ भी सुने हम कोई नतीजा नहीं निकाल सकते है! सुनना ज्ञान की प्रथम जरुरत है! कोई भी ज्ञान प्रथम श्रवण से शुरू होगा! बिना कुछ सुने कोई वस्तु सीखी नहीं जा सकती है! शक्ति का संचार भी सुनने से ही रिलेटेड है! आप को याद होगा रामायण की घटना जिसमे राम और राम के चाहने वाले इस बात को लेके परेशान थे की सीता की खोज में आगे बढ़ना है! तो इस समुद्र को पार करना होगा और ये करेगा कौन? कौन इतना सक्षम है जो उस पार जाके माता सीता का पता कर सके और पुनः यहाँ आके हमें सूचित कर सके? तब हनुमान से जामवन्त ने उन्हें उनकी शक्ति का परिचय कराया ये परिचय उन्होंने कैसे कराया? बोल के! जी हाँ उन्होंने शब्दों में वाणी में उसको बताया और हनुमान ने उसे सुना! सिर्फ सुना भर ही था और उनमे उस शक्ति का संचार हुआ! और नतीजा हम सभी जानते है! हर व्यक्ति में परमतत्व का वास है! हर किसी में घट घट में उसका वास है! ये बात हर कोई जानता है! हर कोई इस बारे में बोलता भी है! परन्तु बहुत कम लोग इस बात को अपने आप में सही तरीके से उतारते है! बहुत ही कम लोग है जो इस बात से भली-भाँती न सिर्फ परिचित है! बल्कि उनमे वह परिवर्तन भी दीखते है! सिर्फ बातो में नहीं अपितु व्यवहार में भी! ये शक्ति उनमे कहा से आई तो जवाब होगा श्रवण! उन्होंने इसकी महिमा को प्रथम सुना है! उसके बाद में आगे जो कुछ होना था वह हुआ! परन्तु प्रथम श्रवण ही है!

बिना श्रवण के आगे बात नहीं बढ़ती है! इस विषय में ज़रा विस्तार से सोच के देखिये! ध्वनि की स्पीड ध्वनि का सृजन, ध्वनि से सृजन ये सब बाते आप के दिमाग में आने लगेंगी! शुन्य से पृथ्वी का निर्माण हुआ! शुन्य में से भी एक ध्वनि का उद्घोश हुआ था और ये निर्मिति का कार्य शुरू हुआ! ऐसा कई सारे ग्रंथो में लिखा हुआ है! ध्वनि बहुत ही महत्वपूर्ण है! उस ध्वनि को किसी ने सुना था तो ही उसे पता चला की निर्मिति का आदेश है! और ये निर्माण कार्य शुरू हुआ! सोचो यदि सुनने वाले ने सुना ही नहीं होता तो????  देखा सोचने का सोच के ही हम हमारे खयाली घोड़े को कहा से कहा ले गए!

                 सही बात है! यदि सुनने वाले ने नहीं सुना होता तो निर्मिति होती ही नहीं! इससे हम समझ सकते है की सुनना कितना जरुरी है! वैसे तो मैंने पहले भी बताया हुआ है! की सुनना सिर्फ कानो से ही नहीं है अलग अलग कान है आप के पास, आँखो के कान है! आप के मन के कान है! आप की त्वचा के भी कान है! नाक के भी कान है! जीभ का भी कान है! तो इन सभी से आप को  सही से सुनना है! जब कोई आप से बात करता है! तो आपको एकाग्रचित्त हो के उसकी बात सुननी चाहिए कम से कम तब तक जब तक उसका बोल के खत्म न हो जाए क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है! की सामने वाले आरम्भ करने के साथ ही हम आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू कर देते है! अपने ज्ञान की तुलना उसके ज्ञान से करने लगते है! अपने आप को ही सही मान लेते है! मेरे भाई ये आदत बुरी है! बदल डालो! आप स्वयं सोच के देखो की आप को यदि किसी को कुछ समझाने के लिए कहा जाएगा तो आप शुरुवात ० से अर्थात शून्य से ही करेंगे! यही वस्तु हर व्यक्ति करता है! क्योंकि उसके सुनने के लिए जो भी लोग जमा हुए है! सभी के सभी आप की तरह ही एक ही बुद्धि वाले हो ऐसा जरुरी नहीं है! और कभी होगा भी नहीं! इसीलिए बोलने वाला अक्सर अपनी बातो को धीरे धीरे कर के सरल करते हुए सहज रूप से आप में उतारने की कोशिश करता है! हो सकता है! आप जिन बातो के बारे में सुनना चाहते है! वह भी वही बोलने वाला हो परन्तु आप में और उसमे फर्क है! अंतर है! उस अंतर को बने रहने दीजिये और सुनिए की उसकी बात कब खत्म होती है! उसके बाद में भी यदि आप का समाधान नहीं हुआ है! आप को आप की वस्तु नहीं मिली है! उसने कोई बात या हर बात गलत की है! तो उसके समक्ष अपने सवालो को जरूर रखे, क्योंकि पहले ही लेख में मैंने बताया है! की सवाल बहुत जरुरी है! सवाल ही अविष्कार का जन्मदाता है! तो सवालों का होना बहुत जरुरी है! परन्तु सवाल करने का ढंग और सवाल करने का समय दोनों सही हो तो जवाब भी सही मिलेगा परन्तु इन दोनों में से एक भी गड़बड़ रहा या दोनों ही गड़बड़ रहे तो फिर जवाब की अपेक्षा भी बेकार है! इसीलिए कार्य को संपन्न करने  किसी भी वस्तु को समझने के लिए सुनना बहुत जरुरी है!

             इसके बाद में आती है बारी याने की दूसरा पग जो की है सुनने के बाद उसे समझने की! जी हाँ! सुन लिया फिर सिर्फ सुन के उसे दरकिनार कर देना या अपने आपको ही सही मान कर किसी बात को भी तूल ना देना बहुत ही बड़ी बेवकूफी है! सुनने के बाद में उस बात को समझना बहुत जरुरी है! कोई भि बात को सुन के लिया और उसे समझ भी लिया तो फिर सोने पे सुहागा जैसा ही होता है! समझना हर किसी के बस के बात नहीं है! सुनना और समझना एक समझदार व्यक्ति ही कर सकता है! जिसमें आत्मसंयम हो जो हर विचार को बारीकी से देखे जिसकी नज़रो में अहंकार न हो! क्योंकि इन में से किसी भी वस्तु का लोप हुआ तो वह व्यक्ति सुनेगा ही नहीं! अन्यथा सुनेगा तो समझेगा नहीं! समझने वाला व्यक्ति अलग ही होता है! आपने बहुत से लोगो को देखा होगा! जो की पूरी मूवी देख लेते है! मगर फिर भी उनके पास सवालो भरमार रहती है! उन्हें किसी वस्तु को किसी बात को समझने का ह्यूमर नहीं होता है! ऐसे व्यक्ति ज्यादातर लोगो में चिड़चिड़ापन का ही निर्माण करते है! ये लोग किसी जोक्स को समझने में ४ दिन लगा देंगे इन्हे हर बात डिटेल में कर के बतानी पड़ती है! फिर भी इनके पल्ले नहीं पड़ती है! ऐसे व्यक्ति सुन के समझने की शक्ति नहीं रखते है! लोगो को समझदार दिखे कर के ये चुपचाप सुन के तो ले लेते है! पर उसको समझ नहीं पाते है कर के आगे भी नहीं बढ़ पाते है! तो हमें ऐसा नहीं बनना है, ये बात याद रखिये! समझने के बाद में किसी भी वस्तु के बारे में लिखना या बोलना बहुत ही आसान हो जाता है! इसीलिए समझना बहुत जरुरी है अगर कोई बात समझ नहीं आती है! तो दुबारा उसपे गौर कीजिये पर समझिए जरूर

            इसके आगे तीसरी सीढ़ी या पग जो है वह है! मंथन की या यूँ कहे जिसे सुना समझा उसपे विचार करने की जरुरत है!  विचार करना किसी भी बात पे बहुत जरुरी है! कई सारी ऐसी बाते होती है, जिन सर पैर कुछ पता ही नहीं चलता है! सब कुछ उसका बेपत्ता होता है! ऐसी बाते भी विचार करने योग्य है! इस दुनिया में हर बात का कुछ न कुछ तो महत्व होता ही है! सिर्फ अंतर इतना ही होता है! की कुछ हमारे महत्व की होती है! कुछ किसी और के! कुछ किसी और के! मगर बिना महत्व कुछ नहीं है! कोई वस्तु हमारे महत्व की है या नहीं ये बात बिना विचार किये पता नहीं चलने वाली! विचार करेंगे तो ही उसका सत्यापन हो पाएगा! विचारों के घोड़े को लगाम नहीं होती है! और मंथन करने की शक्ति हर किसी में नहीं होती है! बहुत बार हम सुनते है अजीब अजीब सी बाते और खुश भी हो जाते है! परन्तु बिना विचार किये हम उस बात के मरहम को पहचान नहीं पाते है! उदाहरण के तौर पे आप से कहता हूँ की आप ने विष्णु के वरह अवतार के बारे में सुना होगा यहाँ पर में आप को पूरा विवरण नहीं दे रहा हूँ बस उसमे से एक लाइन जिसके कारन आप अपने विचार को सही दिशा दे पाये!
 इस कहानी में ऐसा बताया गया है की असुर ने पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया! फिर वरह का अवतार हुआ और उसने पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाला!! अब्ब ये क्या है?   समुद्र तो खुद पृथ्वी पे है तो पृथ्वी को कैसे समुद्र में डूबा दिया ये कैसे मुमकिन है! मगर क्या करे लोगो को विचार करने की सूझती ही नहीं है! किसी का भी कोई भी मंथन किसी बात को लेके नहीं होता है! जो चल रहा है उसे चलने दो सब सही है! बस यही मान के बैठे हुए है मैं आप को थोड़ा सा इसमें क्लियर करने की कोशिश करता हूँ आप खुद मंथन कर के देखिये! हक़ीक़त में पृथ्वी को किसी समुद्र में लेके जाया गया था ही नहीं! आप ने संतो की वाणी में अगर कभी गौर किया रहेगा तो पता रहेगा की संतो ने वेदो ने इस शरीर को भी पृथ्वी कहा है! और जो समुद्र यहाँ दर्शाया गया है वह है रसातल जो की काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, माया से भरा पड़ा हुआ है! इस पृथ्वी को उन असुरो ने इस रसातल में डुबो दिया था कहने का तात्पर्य ये है की उन्होंने हमारी ज़मीन हमारी दुनिया पृथ्वी नहीं बल्कि इस शरीर को पांच तरह के व्यसन जो की हानि पहुंचते है! उनमे डूबा दिया था! काम क्रोध मद मोह लोभ माया इन्हे रसातल कहा जाता है! इसमें विलीन कर दिया था उन्होंने मानवों को इस बात को यहाँ दर्शाया गया परन्तु लोगो ने अलग ही छवि बना ली! इसमें गलती किसकी है! कथा लिखने वाले की नहीं या बनाने वाले की जिसने चित्रण किया! नहीं! इसमें गलती है हमारी जो भेड़ की तरह एक ही दिशा में लगे है! आगे बढ़ने की उसमे से बाहर निकलने की सोचते ही नहीं है!
और ये तो सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण था ऐसे तो न जाने कितने उदाहरण रहेंगे देने के लिए की पूरी वेबसाइट और मेरी ज़िन्दगी दोनों ही कम पड जाये!

               मंथन या कहे की विचार करना बहुत महत्व रखता है! इसके  सहारे बड़े बड़े फैसले भी लेने में आसानी हो जाती है! मंथन आने वाले परिणाम का सटीक नहीं तो भी अंदाजन या यूँ कहे तक़रीबन वाला साक्ष्य करा ही देता है!


        प्रैक्टिकल खुद से कर के देखना! खुद की अनुभूति में किसी वस्तु को लाना! जी हाँ चौथी सीढि या यूँ कहे की चौथा पग अध्ययन का होता है! स्वयं की अनुभूति खुद से कर के देखना! हर बात सुन के समझ के और विचार कर के किसी और के सामने रख देना उचित नहीं है! उसे आप में प्रैक्टिकल होना भी बहुत जरुरी है! यदि आप किसी बात के लिए किसी को समझा रहे है! तो जरुरी है की वह बात आप ने भी प्रैक्टिकली अपनाई हो! उदाहरण के तौर पे आप देख सकते है! बहुत से ढोंगियो को! पैसे कमाने के लिए बैठे गुरु महाराज को उन्हें योग का ध्यान का कोई प्रैक्टिकल नॉलेज नहीं होता है! उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती है! परन्तु सुन सुन के पढ़ पढ़ के उन्हें काफी कुछ पता चल जाता है और इसीकी गोली बना बना के वह लोगो को देते है! और उनका धंधा चल पड़ता है! पर कब तक ये वही लोग है जो आगे चल के भोग विलास में पकडे  जाते है! फिर कानून का डंडा इनका ध्यान पूरा करता है! ये तो हुयी अलग बात मगर आप देखिये बहुत से लोग है ऐसे जो किस तरह से रहना है! क्या करना है! कैसे करना है! सब कुछ बताते है! मगर खुद की बारी आते ही पलट जाते है! तो ये बात उचित नहीं है! ऐसी बाते आप को सही तौर पे उस अनुभूति से वंचित तो रखेंगी ही और आप के जीवन में कोई भी चेंज नहीं आएगा!

हूँ बोलू पछि
मुख खोलू पछि
प्रथम मने आचरण आपजे

बस यही लाइफ में होना चाहिए कुछ भी बोलने के पहले अपने आप में उस आचरण को रखिये वर्ना आप हसी के पात्र के आलावा और कुछ नहीं हो!
बहुत से लोगो को पीठ पीछे बोलने की आदत होती है! ऐसे लोग वही होते है! जो चाहते है की आप आगे न बढे तो ऐसे लोगो को बोलने दीजिये और आप अपना काम सही ढंग से करिये सत्य का रास्ता कठिन है! पर मंज़िल पक्की है!



तो जैसा हमने देखा की
श्रवण
समझन
मंथन
स्वतः अनुभूति

इसके बाद ही कुछ आप का हो सकता है! इस बात को ध्यान रखिये और आगे बढ़ते रहिये

जय गुरुदेव




जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
दीपक बापू                 Deepak Bapu                                     દિપક બાપુ



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शनिवार, 28 मई 2016

દાસ સવા ના ભજન સંગ્રહ

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નર તું નથી રેવાનો રે, માથે સતગુરુને ધારો...ટેક
સતગુરુને ધારશો ત્યારે જનમ મરણ ભે ટાળો...
                         ભાઈયો જનમ મરણ ભે ટાળો...
જ્ઞાન રૂપી ઘટ માં દીવો, મટશે ઘોર અંધારો: - નર તું -૧

કોટી જનમ થયા કર્મ ભોગવતા, તોય ના આવ્યો આરો,
                         ભાઈયો તોય ના આવ્યો આરો
માયાના બંધન માં પડ્યા પાપી મૂઢ ગમારો; - નર તું -૨

આખા દિવસ માં એક ઘડી, તમે સાહેબને સંભારો
                         ભાઈયો તમે સાહેબ ને સંભારો
જમ જ્હાપાટો મારી જાશે, જોખનો કરનારો; - નર તું -૩

ભાગતી ઉપર ભાવ રાખજો મારું તારું મેલો
                         ભાઈયો મારું તારું મેલો
આંટો ખાવવા નથી આવવું, આ અવસર છે છેલ્લો; - નર તું -૪

અલખ નિરંજન ધણી આપનો, લેખાનો લેનારો
                         ભાઈયો લેખાનો લેનારો
સવો પ્રજાપતિ દાસ સંતનો, સતગુરુ પાર ઉતારો; - નર તું -૫

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સમાગમ કરો સંતનો રે, આ તો ફના જગત ફેલાણી
ફના જગત માં શું ફેલાણા, મોજું વિરલે માણી
ભાઈયો મોજું વિરલે માણી
રાવણ જેવા રાજા ગયા એ મોટી એંધાણી -૧

વાતું કરતા વયા ગયા તેની નો મળે નિશાની
ભાઈયો તેની નો મળે નિશાની
હારી ગુરુ સંત ને સેવિયા, તે પ્રગટ છે પ્રમાણી -૨

જમણો મારતો જોરાવર છે, મરડ ના રાખો ઠાલો,
ભાઈયો મરડ ના રાખો ઠાલો,
સંગ કરો કોઈ સાધુ જન નો, તો અમારાપારમાં માળો -૩

દયા રાખજો દિલ ની ભીતર, આ વેળા નહિ આવે
ભાઈયો આ વેળા નહિ આવે
સમ્જ્હી ને કોઈ સંત સેવશે તો, ફેરો તેને ફાવે -૪

શરણે આવ્યો શ્યામ તમારે, વારુ કરજો વેલ્લી
ભાઈયો વારુ કરજો વેલ્લી
સવો પ્રજાપતિ કે સતગુરુને, થાજે અંતકાલ ના બેલી-૫

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शुक्रवार, 27 मई 2016

जूना धर्म ल्यो जाणी मारा संतो

जूना धर्म ल्यो जाणी मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी,

नदी किनारे नर कोई उभो, तृष्णा नहीं छिपानी,
का तो एनु अंग आलसु, का सरिता खरे सुखानी!
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी

कल्पतरु तले जन कोई बैठो, क्षुदा खूब पीड़ानि रे,
नहीं कल्पतरु, ऐ बवालियों, का भाग्य रेख भेलानी
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी

सद्गुरु सेवई शिष्य नव सुधरे, विमल मलि नहीं वाणी रे
का तो गुरु जी ज्ञान विणा ना, का पापी पामर आ प्राणी
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी,

भक्ति करता भय दुःख आवे, धीरज नहीं ठेरानि रे
का सम्झन रही छे छेटी, का नहीं ऐ नाम निर्वाणी
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी,

मलि चिंतामणि पण तो ये, चिंता नव ओलानी रे
नहीं चिंतामणि, नक्की ऐ पथरो, का वास्तु नव ओळखणि
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी,

मल्यु धन तोए मौज ना मानी, कहु कर्मनि कहानी रे
का तो भाग्य बीजाणु भनियु, का तो खोटी कमानी
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी,

अमृत मल्यु पण अमर थयो नहिं, पिवनी जुक्ति ना जाणी रे






कल्पतरु तले जन कोई बैठो, क्षुदा खूब पीड़ानि रे,
नहीं कल्पतरु, ऐ बवालियों, का भाग्य रेख भेलानी
--मारा संतो, जूना धर्म ल्यो जाणी


ये बात हर कोई जानता है की प्रभु हर जगह मौजूद है हर किसी में मौजूद है!
मुझ में तुम में हर किसी में, पर इस बात को जानते हुए भी हम अंजान ही रहते है!
संतो के समागम के बावजूद भी हममे कोई परिवर्तन आ नहीं पाता है, संत उस कल्पतरु वृक्ष के सामान है
जिसके पास हमारी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रह सकती, मगर फिर भी उस संत के चरण में रह के भी उस कल्पवृक्ष या यूँ कहे की देह धारी गुरु के छत्र में रह कर भी हम कुछ सिख नहीं पाते है, और हमारी प्यास ज्यो की त्यों रह जाती है! इसमें कल्पतरु की गलती माने, या हमारा अहंकार, हमारा पागलपन उसकी गलती माने, या इन सब से पर भाग्य का लिखा हुआ मान के छोड़ दे की शायद हमारी किस्मत में कल्पतरु के वृक्ष का लाभ नहीं है!

जूना धर्म, इस जुने धर्म में इन बातो का समावेश है, सत्य का समावेश है, इसको जानना बहुत जरुरी है! सत सनातन इश्वर की भूमिका, वेद ग्रन्थ सबकुछ इसी से विस्तारित हुआ है! इसी जुने धर्म से तो जिसने ये जूना धर्म जान लिया उसके लिये सब कुछ सरल और सहज हो जाएगा


ये मेरी समझ थी इसके साथ किसी की कोई आपत्ति रहे या कोई और भी समझन रहे तो अवश्य साँझा करे धन्यवाद
नागेश शर्मा














बुधवार, 25 मई 2016

साखी संग्रह saakhi sangrah સાખી સંગ્રહ

साखी संग्रह saakhi sangrah સાખી સંગ્રહ
ગુજરાતી સાખી નું સંગ્રહ
गुजराती साखी के संग्रह

१) पापा पापा सब कहे, माता कहे न कोई
पापा के दरबार में जो माता कहे सो होए

२) इश्क़ करने वाले को वहदत का मज़ा मिलता है
इश्क़ सच्चा हो अगर तो बन्दे को खुदा मिलता है

३) रहे बंदगी से दूर वह बन्दा नहीं होता
रखे जो बंदे से परहेज वह मौला नहीं होता
बता मेरे मौला सजदा करू तो किधर करू
दोनों की शकल एक है, खुदा कहु तो किसको कहू

४) आदमी का जिस्म क्या है, जिसमे सेह्ता है ये जहां
एक मिटटी की इमारत बनी, एक मिटटी का है मकान!
खून की धारा बने ईंट है इसमें हड्डिया
और चाँद साँसों पे खड़ा है ये खयाली आसमान
मौत के पुरजोश से जिस दिन ये आँधी टकराएगी
टूट के ईमारत ये उस दिन ख़ाक में मिल जाएगी

५) ख़ाक में तो हम मिल गए दोस्तों, ख़ाक में घर बार मिला
जोगी बन बन दर बदर भटके, फिर भी न वह दिलदार मिला
दीवाना कहते है है मुझको तो सिर्फ नादानी है!
मैं हूँ दाना  और ये दुनिया दीवानी है!

६) (१) "पहली सलामी पृथ्वी ने करिये, जेने पीठ पर पग दई फरिये
           करू परिक्रमा शीश नामवि, सवा शेर माटी नि जेने काया बनावी"

    (२) "बीजी सलाम करू अन्न, जल, अग्नि, जिव्हा डोरी ये जग जगनी
          आपणी  श्रुष्टि आपणे खावे, बीजी सलाम करू  मन भावे"

    (३) "त्रिजी सलाम करू त्रिकाला, चन्द्रमा भान मोठा महिपाला
          अवे आप श्रुष्टि मा करो अंजुवाला"

    (४) "चौथी सलाम मा चारो खाणी, एक बीजक नि जगत बंधाणी
          अविनाशी पर्चो छे एमा, चौथी सलाम नि मोठी महिमा"

    (५) "पांचवी सलाम करू  पहाड़ वन खण्डी, जेने  वेक्खि तापी अने ठंडी
          शरीर वेराय सेव काय कीधी, पांचवी सलाम रहो सौ रीझि"

    (६) “छठी सलाम करू सतवाचा, सत्कर्म मन अने वचनो ना साचा
          सत् चित रहे आनंद एक रंगा, छठी सलाम करू गतगंगा"

    (७) "सातवी सलाम करू शेष ने छेल्ली, पृथ्वी ना भार रह्या छे झेली
          सकल श्रुष्टि वसे तम माथे, सात सलाम करू बेयो हाथे"
 
         "दृश्या दृष्टि अलख तू एक ही, सात सलाम करू एम देखि
          आपणी सलाम करिष्ये आपे, दास सवो सतगुरु माप अमापे"


७) पशु की पनिया बने, नर का कछु नहीं होये
     जो नर करनी करे तो नर से नारायण होए

८) करे सहाय किरतार तो, अगन ने आंच न आवे
     करे सहाय किरतार तो, दुष्ट नडे नहीं दावे
     करे सहाय किरतार तो, रंक ने रिद्धि आप 
     करे सहाय किरतार तो, बंधन बेली कापे 
     करे सहाय किरतार तो, खडग नि ढाल न कापे 
     करे सहाय किरतार तो, भिखारी भूपत थापे 
     दीनानाथ दयालु छे, ऐना वखान शु ज्या ज्या करो!
    दास सवो दिल सत कहे, दूरिजनो थी दूर रहो!


०९)  लिखा है किस्मत मे परदेस वतन को तो याद क्या करना
        जहां कोई नहीं अपना, वहा फरियाद क्या करना

१०) चित चटको लाग्या वीना क्या रीझे किरतार
    इयड की भमरी बने, तो नर ने केटलिक वार

११) साया तू बड़ो धनि, तुझसे बड़ा न कोये
    तू जेना सर हाथ राख दे, उससे बड़ा न कोये

१२) पड़ा रहे दरबार में, धक्का धणी का खाए
    कब उकले लेहेर दरियाव की, बेडा पार हो जाए

१३) संत मिलन को जाइए, तजि मान मोह अभिमान!
    ज्यो ज्यो पग आगड वधे कोटि यज्ञ समान!

१४) राम झरोखे बैठ के, सबका मुजरा लेत,
    जैसी जिनकी चाकरी, वैसा फल को देत!

१५) राम किसी को मारत नहीं, ऐसा पापी नहीं मेरा राम!
    सब अपने आप मर जात है, वह तो कर के बुरो काम!

१६) मरू मरू सब करे, मरे मेरी बलाये
    जो पाना था वह पा लिया, अब क्यों मरने जाए 

१७) मैं ये जाना था खूब खाऊंगा, पहले कमा लू माल 
    ज्यो का त्यों धरा रह गया, सब ले गया काल 

१८)  हद चले सो औलिया, बेहद चले पीर
       हद बेहद बेयो चलें, वाका नाम फ़क़ीर!

१९)  विरह की याद में तड़पत भए
    ना रात सूझत ना दिन
    मैं तो सुधबुध सब खो बैठी
    तुम रहे कठोर न दर्शन दीन्ह  (नागेश)

२०) गुरु बिन न हस्ती मेरी
    न हस्ती तेरी न हस्ती परमातम की
    गुरु मिले तब रास्ता दिखाए
    ज्ञान मिले तब आतम की  (नागेश)

२१) शब्द की महिमा का बखान कर, शब्द को धो कर पी
    शब्द कटारी घाव करत है, शब्द मरहम करत औषधी
    शब्द शब्द का खेल निराला, शब्द गुरु मतवाला है!
    शब्द की धुनि लगा आतम पे, शब्द सहज तू पी  (नागेश)

२२) तुझमे खुदा बस्ते है बस यही सोच के चले जा रहा हूँ
    तुझसे मिलने के खातिर जो कदम बढाए तो हर जगह खुद को खड़ा पा रहा हूँ
    ज़िन्दगी का आयाम कितना छोटा लगेगा ये सोचा नहीं था कभी
    जब से बात तेरी आई है मैं तो बस ज़हर पीए जा रहा हूँ  (नागेश)

२३) गुरु से मिलकर मैंने जाना है तुझे, मेरी नस नस में तू ही तू समाया है!
   मैं तेरा हूँ या तू मेरा है??? आखिर किसने किसे आज़माया है!
   मैं तुझमे समां जाऊंगा या तू मुझमे समां जायेगा, इसकी खबर पड़ती नहीं थी
   गुरु ने मेरे मुझसे मेरा रूबरू कराया है!  (नागेश)

२४) ये दर्द दिलो का है, शब्दों में बयां नहीं होगा 
   ये दर्द दिलो का है, शब्दों में बयां नहीं होगा
   इसके लिए दिल ही चाहिए वर्ना तुम्हारे लिए ये फसाना नया नहीं होगा
   तुम्हे तो आदत है मेरे जज़्बातों से खेलने की
   तुम्हे तो आदत है मेरे जज़्बातों से खेलने की
   पर याद रखना हर बार तुम्हारी ठोकर खाने को मेरा दिल वहा नहीं होगा  (नागेश)


२५) बहुत कम माली होते है जिन्हे फूल प्यारे होते है,
    बाकियो को तो पैसे ही प्यारे होते है,
    ये चाहत ही कुछ अलग है ज़नाब पैसे की,
    तभी तो फूल अपने वज़ूद से अलग होते है!
    पर 
    फूल की भी अपनी किस्मत है कभी बाजार में कभी दरबार में
    माली तूने तो अलग कर दिया है! हम भी खड़े है इंतज़ार में!
    न जाने किस्मत कहा ले जाएगी हमे! किसी बाजार में या किसी दरबार में   (नागेश)

२६) मेरी महक, मेरा वज़ूद, मेरा भरोषा मुझपे तुझसे ज्यादा है!
    राम नाम का सिर्फ ढोंग नहीं, वचन मेरी मर्यादा है!
२७) तकलीफ होती है जब कोई अपना रूठता है!
    तकलीफ होती है जब कोई अपना टूटता है!
    तकलीफ होती है जब किसीका साथ छूटता है!
    पर हमने भी जीना सिख ही लिया ए ज़िन्दगी इस ग़म-ए-बाजार में 
    पर हमने भी जीना सिख ही लिया ए ज़िन्दगी इस ग़म-ए-बाजार में
    अब तो तेरी राह भी देखनी छोड़ दी हमने 
    तुझपे निगाह भी रखु तो मेरा विश्वास टूटता है!  (नागेश)

२८) नारी प्रतिक, नारी अतीत, नारी ही वर्तमान
    नारी सटी, नारी शक्ति, नारी ही भविष्य का द्वार 

$જ્ઞાન કથીને ગાડાં ભરે# પણ અંતરનો મટે નહિ વિખવાદ$
$કહે કબીર કડછા કંદોઈના# કોઈ દી’ ન પામે સ્વાદ.#$
$રામ જપે અનુરાગસે, સબ દુખ ડાલે ધોઈ$
$વિશ્વાસે તો હરી મિલે, લોહા ભી કંચન હોય.$
$દયા ગરીબી બંદગી, સમતા શીલ સુજાણ$
$ઐસે લક્ષણ સાધુકે કહે કબીર તું જાણ.$
$કાયા તું બડો ધણી, અને તુજસે બડો નહીં કોઈ,$
$તુ જેના શિર હસ્ત દે, સો જુગમેં બડો હોઈ.$
$રામ નામ રટતે રહો અને ધરી રાખો મનમાં ધીર$
$કોઈ દિન કાર્ય સુધારશે, કૃપા સિંધુ રઘુવીર.$
$સગા હમારા રામજી, અને સહોદર પુનિ રામ,$
$ઔર સગા સબ સગમગા, કોઈ ન આવે કામ.$
$કામ ક્રોધ મદ લોભકી, જહાં તક મનમેં ખાન,$
$કહાં પંડિત મૂરખ કહાં, દોઉ એક સમાન.$
$રન બન વ્યાધિ વિપત્તિમેં, રહિમન મર્યો ન રોય,$
$જો રક્ષક જનની જઠર, સો હરિ ગયે નહીં સોય.$
$નામ લીયા ઉસને જાન લીયા, સકલ શાસ્ત્રકા ભેદ,$
$બિના નામ નરકે ગયા, પઢ પઢ ચારોં વેદ.$
$કબીર કહે કમાલકુ, દો બાતાં શીખ લે,$
$કર સાહેબકી બંદગી ભૂખે કુ કુછ દે.$
$હાડ જલે જ્યું લાકડી, કેશ જલે જ્યું ઘાસ,$
$સબ જગ જલતા દેખ કે, કબીરા ભયો ઉદાસ.$
$માલા તિલક બનાય કે ધર્મ વિચારા નાહિ,$
$માલા બિચારી ક્યા કરે, મૈલ રહા મન માંહિ.$
$રાત ગવાંઈ સોય કર, દિવસ ગવાયો ખાય$
$હીરા જનમ અનમોલ થા, કૌડી બદલે જાય.$
$કાલ કરે સો આજ કર, સબહિ સાજ તુજ સાથ,$
$કાલ કાલ તું ક્યા કરે, કાલ કાલ કે હાથ.$
$સાધુ ભયા તો ક્યા હુવા, માલા પહિરી ચાર,$
$બાહર ભેષ બનાઈઆ, ભીતર ભરી ભંગાર$
$પ્રેમ છિપાયા ના છિપે, જ્યા ઘટ પરગટ હોય,$
$જો પૈ મુખ બોલે નહીં, નૈન દેત હૈ રોય.$
$જબ મેં થા તબ હરિ નહીં, અબ હરી હૈં હમ નાહીં,$
$પ્રેમ ગલિ અતિ સાંકરી, તમેં દો ન સમાહિ.$
$તુલસી મીઠે વચન સે સુખ ઉપજે ચહુ ઓર,$
$વશીકરન યહ મંત્ર હૈ, તજહું વચન કઠોર.$
$ફિકર સબકો ખા ગઈ, ફિકર સબકા પીર,$
$ફિકરકી ફાકી કરે, ઉનકા નામ ફકીર.$
$ગ્રંથ પંથ સબ જગતકે, બાત બતાવત તીન,$
$રામ હ્રદય, મનમેં દયા, તન સેવામેં લીન.$



जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

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