"नाम" नागेश जय गुरुदेव (दीपक बापू)

बुधवार, 11 मई 2016

નાગેશ દ્વારા લિખિત સાખી / / नागेश द्वारा लिखित साखी

નાગેશ દ્વારા લિખિત સાખી
नागेश द्वारा लिखित साखी



१) विरह की याद में तड़पत भए
ना रात सूझत ना दिन
मैं तो सुधबुध सब खो बैठी
तुम रहे कठोर न दर्शन दीन्ह

२) गुरु बिन न हस्ती मेरी
न हस्ती तेरी न हस्ती परमातम की
गुरु मिले तब रास्ता दिखाए
ज्ञान मिले तब आतम की

३) शब्द की महिमा का बखान कर, शब्द को धो कर पी
शब्द कटारी घाव करत है, शब्द मरहम करत औषधी
शब्द शब्द का खेल निराला, शब्द गुरु मतवाला है!
शब्द की धुनि लगा आतम पे, शब्द सहज तू पी

४) तुझमे खुदा बस्ते है बस यही सोच के चले जा रहा हूँ
तुझसे मिलने के खातिर जो कदम बढाए तो हर जगह खुद को खड़ा पा रहा हूँ
ज़िन्दगी का आयाम कितना छोटा लगेगा ये सोचा नहीं था कभी
जब से बात तेरी आई है मैं तो बस ज़हर पीए जा रहा हूँ

५) गुरु से मिलकर मैंने जाना है तुझे, मेरी नस नस में तू ही तू समाया है!
मैं तेरा हूँ या तू मेरा है??? आखिर किसने किसे आज़माया है!
मैं तुझमे समां जाऊंगा या तू मुझमे समां जायेगा, इसकी खबर पड़ती नहीं थी
गुरु ने मेरे मुझसे मेरा रूबरू कराया है!


६) ये दर्द दिलो का है, शब्दों में बयां नहीं होगा 
ये दर्द दिलो का है, शब्दों में बयां नहीं होगा
इसके लिए दिल ही चाहिए वर्ना तुम्हारे लिए ये फसाना नया नहीं होगा
तुम्हे तो आदत है मेरे जज़्बातों से खेलने की 
तुम्हे तो आदत है मेरे जज़्बातों से खेलने की 
पर याद रखना हर बार तुम्हारी ठोकर खाने को मेरा दिल वहा नहीं होगा

७) बहुत कम माली होते है जिन्हे फूल प्यारे होते है,
बाकियो को तो पैसे ही प्यारे होते है,
ये चाहत ही कुछ अलग है ज़नाब पैसे की,
तभी तो फूल अपने वज़ूद से अलग होते है!
पर 
फूल की भी अपनी किस्मत है कभी बाजार में कभी दरबार में
माली तूने तो अलग कर दिया है! हम भी खड़े है इंतज़ार में!
न जाने किस्मत कहा ले जाएगी हमे! किसी बाजार में या किसी दरबार में

८) मेरी महक, मेरा वज़ूद, मेरा भरोषा मुझपे तुझसे ज्यादा है!
राम नाम का सिर्फ ढोंग नहीं, वचन मेरी मर्यादा है!

९) तकलीफ होती है जब कोई अपना रूठता है!
तकलीफ होती है जब कोई अपना टूटता है!
तकलीफ होती है जब किसीका साथ छूटता है!
पर हमने भी जीना सिख ही लिया ए ज़िन्दगी इस ग़म-ए-बाजार में 
पर हमने भी जीना सिख ही लिया ए ज़िन्दगी इस ग़म-ए-बाजार में
अब तो तेरी राह भी देखनी छोड़ दी हमने 
तुझपे निगाह भी रखु तो मेरा विश्वास टूटता है!

१०) नारी प्रतिक, नारी अतीत, नारी ही वर्तमान
नारी सटी, नारी शक्ति, नारी ही भविष्य का द्वार 

११) साधु बात न मानिए, हमन नहीं कछु बैर
हम तुम तुम पहचानिए, मांगिये सबन की खैर
सही भूमि बीज धरे, लागे फल खिले पेड़
सोय सत-संग करीले, देखिले होत हो फेर?

११) मैं की तो गिनती ही नहीं, हम भी लगे है कम,
सब कुछ मिला के देख लिया, जो पाया सब कम,

क्या करे, क्या न करे, नहीं और नहीं छोर
मिलाना था सो ही रह गया, समय तने अब यम 


जिसे कुछ भी समझने में या गैर-समझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
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SAWAL PRASHNA QUESTION

ભગતિ રૂપી મણિ લેજો હાથમાં રે,માયા રૂપી વનનો ભે મટી જાય,

 ભગતિ રૂપી મણિ લેજો હાથમાં રે,માયા રૂપી વનનો ભે મટી જાય,
 જોગ રૂપી દીપક કહીએ ઈ તો, જેનાથી વિષય વાસના બુઝાય રે.
 ભગતિ રૂપી મણિ લીઓને હાથમાં રે...
 ભગતિ રૂપી મણિ જેના રે હાથમાં ને, તેને નડે નહીં વિષયના વાય રે
 અખંડ પ્રકાશ કોઈ દિ’ ઓલાય નૈં ને, ભગતિ હરિની પરગટ થાય રે.
 ભગતિ રૂપી મણિ લીઓને હાથમાં રે...
 હઠ વશ થઈને શઠ કરે સાધના પણ, ભગતિ વિના હરિ નો ભજાય,
 પુરણ પુરષોત્તમને ભગતિ છે વાલી રે, ભગત વશ વૈકુંઠરાય રે.
 ભગતિ રૂપી મણિ લીઓને હાથમાં રે...
 ભગતિયે વ્રજના વનમાં ઓછવ કીધાં ને, અજિતને જીત્યા એના દાસ
 ગંગાસતી એમ બોલિયાં પછે રે, વૃથા નો જાય એની સુવાસ રે.
 ભગતિ રૂપી મણિ લીઓને હાથમાં રે..


जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
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SAWAL PRASHNA QUESTION
 

मानव स्वभाव (परिवर्तन)

              मानव का स्वभाव बहुत ही बेजोड़ है जी हां इसका कोई जोड़ ही नहीं है! पल में हँसता है पल में रोता है! न जाने क्या क्या इसके दिमाग में चलता है! इसके मन की बात जानने की कोशिश करना बहुत मुश्किल है! शब्दों पे ग़ौर कीजिएगा की मुश्किल है नामुमकिन नहीं! आज हम कुछ इसी विषय पे चर्चा करेंगे और फिर आगे चल के इसको आध्यात्मिक के मार्ग से समझने की कोशिश करेंगे!
   
             सभी तरफ से इंसान की एक खासियत यही है की हर बात में उसको अपनी ही चीज़े सही लगती है! १ लाख लोगो में से १ शायद ऐसा मिले जो सही का दामन पकड़ के ही चले अपनी हर गलती मान ले! हर तरह से अपने कर्तव्य का पालन करे! अपने हर कदम को फूंक फूंक के रखे! उसकी वाणी में निर्मलता हो! ऐसे व्यक्ति बहुत मुश्किल से ही मिल पाते है! पर अफ़सोस ऐसे लोगो को अक्सर दुनिया बेवकूफ़, गधा ही समझती है! मनुष्य बहुत ही मतलबी प्रकार का होता है ये उसकी प्रकृति में ही है! दुनिया में कोई भी वस्तु बिना मतलब के है ही नहीं! छोटी सी छोटी वस्तु फिर वह चाहे कुछ भी हो! कुछ भी! हर वस्तु का अपना मतलब है! हर वस्तु का अपना नियम है! हर वस्तु अपने आप में बेजोड़ है! इसीलिए किसी भी जीव को, मनुष्य को, या वस्तु को छोटा समझना छोड़ दीजिए सबसे पहले तो! हर वस्तु की अपनी एहमियत, अपना स्वाभिमान होता है! और जैसे आप के स्वाभिमान को ठेस पहुंचे तो दुःख होता है ठीक उसी प्रकार किसी के भी स्वाभिमान को ठेस हमें नहीं पहुंचाना चाहिए! इश्वर में यदि आप का विश्वास है! आप उसमे मानते है! उसका मानते है! तो ये बात याद रखिये की इश्वर कभी किसी का बुरा नहीं चाहते है! अतएव आप भी किसी का बुरा न करे क्योंकि किसी का बुरा करने वाले को ईश्वर क्यों चाहेगा!

                 और दूसरी दृष्टि से देखते है तो पता चलता है की "पावर ऑफ़ अट्रैक्शन" इसके बारे में आप सभी ने सुना ही होगा! बड़े बड़े लोगो ने इसके सिद्धांत को मान है, महसूस किया है! और अपनी अपनी राय रखी है! ये सिद्धांत कुछ ऐसा है की आप जब किसी के बारे में ज्यादा सोचते है! उसके प्रति आप का विश्वास गहरा होने लगता है! तो वह आप के पास आ ही जाती है! या कहिये की आप में आ ही जाती है! उदाहरण के तौर पे देखते है! की यदि समझो आप सुबह सुबह उठ रहे है! और कुछ गलत हो गया तो आप समझ बैठते है की आप का आज दिन ख़राब जाने वाला है! और आप के दिमाग में ये बात घर करने लगती है! आप बहार निकलते है! तो आप पहले से यही सोचते है की आज का दिन ख़राब है! गाड़ी नहीं मिलेगी बस छूट जाएगी! और यही होता भी है! और अगर सीधी तौर पे नहीं होता है! तो ऐसा ही कुछ होता ही है! जैसे की बस जल्दी नहीं मिलती है! गाड़ियाँ जल्दी नहीं रूकती है! ऑटो, टैक्सी कोई सवारी नहीं मिल पाती है! समय और आपका धीरज दोनों ही साथ साथ चरम पर पहुंच जाते है! और आगे आगे जैसे जैसे आप बढ़ते है! आप की मीटिंग ख़राब होती है! आप के खाने में देरी होती है! कारोबार नहीं हो पाता है! सब कुछ ठीक वैसा ही होने लगता है! जैसा की आप ने सोचा होता है! शॉर्टकट में कहे तो दिन सही मायने में ख़राब हो ही जाता है!   इसका मतलब आप क्या समझते है! ऐसा क्यों हुआ! जी हाँ इसका कारन था "पावर ऑफ़ अट्रैक्शन" प्रकृति ये नहीं सुनती की आप को क्या चाहिए या नहीं चाहिए उसे हाँ या ना का मतलब नहीं पता है वह सिर्फ इतना ही जानती है की आप के दिमाग में क्या चल रहा है किस के बारे में आप ज्यादा सोच रहे है और वह उस वस्तु को आप के सामने ला के रख देती है!

               हर बार ऐसा ही होता है! लोग कर्ज के बारे में ही सोचते रहते है और कर्ज में ही डूबे रह जाते है! हर समय उनके दिमाग में यही चलता रहता है और इसी के चलते उनका सामना हर बार उसी वस्तु से होता है! उसी व्यक्ति से होता है! जिसको वह मिलना तो नहीं चाहते है! मगर सोचते हमेशा उसीके बारे में है! तो सब से पहले तो ये समझ लीजिए की निगेटिव थिंकिंग को आप अपने दिमाग से हटा दीजिए! जिस वस्तु की जरुरत है ही नहीं उसके बारे में सोचिए भी मत! क्योंकि आप का सोचना प्रकृति को उस वस्तु के लिए निमंत्रण देता है! और जब आप इसको प्रैक्टिकल कर के देखेंगे तो आप को परिवर्तन स्वयं में महसूस होगा! और फिर आप को अच्छी बाते सोचनी है! अच्छा टारगेट सोचना है! जिस वस्तु की जरुरत है उसके बारे में ध्यान दीजिए और देखिये आप को क्या मिलता है! प्रकृति का स्वभाव बहुत ही अनूठा है! वह तुरंत कोई काम नहीं करती है! उसके लिए माहौल बनाती है! उसके लायक माहौल बनने पे आप को वह वस्तु खुद मिलती है! इसमें थोड़ा समय तो लगता है! पर उतना नहीं जितना आप सोच रहे है! ये काम होता है! सही समय में होता है! और आप की आशा के अनुसार ही होता है! मगर ये आप की सोच और आप की पोसिटिवनेस पे लंबित करता है! की उसमे कितना समय लगेगा!

           अक्सर मानव अपने आप से ये सवाल नहीं करता है की उसको यहाँ क्यों भेजा गया है! आखिर वह क्या काम करने आया है! उसके मन में अगर कुछ चलता है! तो वह है कुछ मिला लेना कुछ प्राप्त कर लेना! देखा जाए तो मानव पूरी तरह से मोह माया के जाल में फंसा हुआ ही है! ये मोह माया का जाल मैं नहीं कहता हूँ की कोई बुरा जाल है! क्योंकि जैसा मैंने पहले  भी लिखा हुआ था ही की मानव शरीर ३ गुण ५ तत्व  और २५ प्रकृति का मिला जुला स्वरूप ही है! तो ये लाज़मी है की उसमे ये सभी वस्तु देखने को मिलेंगे! गलत इसमें होता है! उनको हासिल करने का तरीका! अक्सर मानव इन्हे हासिल करने के लिए गलत तरीके अपनाता है! और पतन की तरफ मूड जाता है! आखिर क्या फायदा है! ये सब करके! जिसको इतना चाहा, जिसके लिए दिन रात एक कर दिया! वह मिलने के बाद में भी हमें शांति नहीं मिलती है! अक्सर एक धोखे में एक डर में जीते रहते है! क्या आप यही चाहते थे?

                पैसे जमा कर कर के आप ने अपने बच्चे को अच्छी उच्च शिक्षा देने के लिए बाहर भेज दिया ! और आप को फिर भी डर लगा रहता है! की कहीं वह बिगड़ ना जाए कहीं उसमे कोई खराबी ना आ जाये! इतना कुछ कर के भी आप को यकीन नहीं होता है! की आने वाला परिणाम कैसा होगा! हर वस्तु आप करते खुद ही है! पर खुद आप को अपने कर्म पे विश्वास नहीं है! हर बार एक ही बात की जो भगवान करेगा वह ही होगा! सिर्फ बोलने के लिए ही करना खुद है! फल की इच्छा भी अपने हिसाब से है! तो भगवान् का नाम क्यों ख़राब करना! उसने क्या बुरा सिखाया! क्या आप ने संस्कार दिए है! अपने बच्चे को नहीं! क्यों! क्योंकि आप अपनी मोह माया की दुनिया में सिर्फ पैसे को ही सर्वोपरि मान रहे थे! मानना भी चाहिए मैं नहीं कहता हूँ की पैसे की जरुरत नहीं होती है! मगर टाइम समय का सदुपयोग इस बात पे कौन ध्यान देगा! इसका ठेका किसने लेके रख हुआ है! आखिर इस और भी तो आप को ध्यान देना है! आप क्यों इसको छोटी सी बात समझ के इग्नोर कर देते है! अपने आप में परिवर्तन लाइए! परिवर्तन बहुत जरुरी है! जो जैसा चलता आया है! यदि वैसा ही छोड़ दिया रहता तो सृष्टि कभी आगे नहीं बढ़ पाती! इसीलिए परिवर्तन को खुले दिल से स्वीकार कीजिये और परिवर्तन का हिस्सा बनिए! आदतों को सुधारे! गलत काम से बनने वाले काम को रोक ही दीजिये! ना बोल दीजिये! कोई जरुरत नहीं है! की हम गलत तरीके से ही कुछ पाये! सही तरीका भी होता है! अक्सर बचपन से सुनते आये है कई बार तो लोगो ने कइयों को बोल भी रहेगा! की अपनी चादर के हिसाब से ही पैर फैलाने चाहिए! तो सिर्फ बोलने के लिए! करने के लिए नहीं! "केहनी माँ!!! रेहनी माँ नथी रेवातु!" क्या है ये!

               मैंने ये बात बहुत बार महसूस की है की जब मैं बोलना शुरू करता हूँ कहीं भी तो बहुत से लोगो का व्यवहार ऐटिटूड! कुछ इस तरह रहता है की वह सब कुछ जानते है! उन्हें किसी वस्तु की जरुरत नहीं है! वह पुरे के पुरे है! अरे भाई रहोगे मैंने कब मना किया है! मैंने तो पहले भी कहा है! की आप लोग ज्ञानी ही हो पर थोड़े से अंजान हो! हर किसी को पता होता है! की वह सही कर रहा है! या गलत कर रहां है! पर समस्या यही होती है! की पता रहते हूए भी उक्त व्यक्ति उस कार्य को करता ही है! आखिर ऐसा क्यों करता है वह! इसका कारन है! उसका अंजान होना! आने वाले परिणाम से अंजान होना ही उसके पतन का कारन बनती है! इसी लिए सब से पहले तो जानकार बनिए! किसी वस्तु को देखना सुनना अलग वस्तु है! पर खबर रखना बहुत जरुरी  इसीलिए हमेशा कहता हूँ की अंजान मत रहो! खबर रखो!

                 कुछ पाने की इच्छा रखना सिर्फ इच्छा तक सिमित नहीं रहनी चाहिए उस दिशा में वैसा काम भी होना चाहिए! पॉजिटिवनेस बहुत जरुरी है! कोई भी काम स्टार्ट करने के पहले उसमे अगर हमारा कॉन्फिडेंस नहीं होगा हमारे अंदर उसके प्रति सही रूचि पोसिटिवनेस नहीं होगी तो वह काम आगे चल के ख़राब होना ही है! मगर हमारे भीतर कॉन्फिडेंस और पॉजिटिवनेस हो तो लगभग आधा काम तो वही हो जाता है! ये बात सभी जानते है! बोलते भी है! पर करते नहीं है!  बहुत पहले एक जगह हमारी एक ऑन्टी के मुँह से मैंने ये सूना था! तभी मैं बहुत छोटा था! कहते है कुछ बाते होती है जो दिमाग पे असर छोड़ देती है! बस वैसा कुछ ही है ये! की "सोचने में समय ज्यादा लगता है तो फैसले कमजोर हो जाते है!"  उसके बाद इस शब्द के सत्यापन के लिए मैंने बहुत खोज बीन की खुद पे  चूका हूँ बहुत बार यह सही निकला! मगर कुछ जगहों पे ये गलत भी निकला देखा जाए तो ये गलत बहुत लिमिटेड वस्तु में ही निकला वह ऐसी बाते थी जिन्हे हम बड़े डिसीजन्स भी बोल सकते है!बच्चे की पढ़ाई, कारोबार का बढ़ाना वगेरा! ऐसे में एक लम्बी सोच की जरुरत रहती है! कुछ निर्णय ऐसे होते है जिनके लिये एक अच्छे और समझदारी भरे सोच की जरुरत होती है! और उसके बाद जब इसमें कदम रखते है! तो गाडी बहुत दूर तक जाती है! कहने का मतलब है! दोनों वस्तु में कोई गलत नहीं है! मगर दोनों की जगह उनका सही मायने में जरुरत पूरा करती है! जरुरत होती है हमें समझदार बन के सही वस्तु, सही व्यवहार, सही निर्णय को सही समय पे लेने की! इसे सीखने की भी जरुरत नहीं है! पता सबको है! बस अंजान बन जा रहे है! और भेड़ की तरह चले जा रहे है! परिवर्तन! बहुत जरुरी है! हमें अपने देश के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति यदि कुछ करना है! राम लक्षमण कृष्णा कबीर, स्वामी विवेकानंद जैसा बनना है! तो हमें भी परिवर्तन का हिस्सा बनना पड़ेगा! इतिहास पढ़ने की जरुरत नहीं है! इतिहास बनाने की जरुरत है! अपने आप को आज ही सही दिशा में मोड़ लीजिए! परिवर्तन को न्योता दे दीजिये! काबिल बनिए! आदर्श बनिए! आप सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना है!




जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

जय गुरुदेव                Jay Gurudev                                     જાય ગુરુ દેવ
नागेश शर्मा               Nagesh Sharma                                  નાગેશ શર્મા
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ક-ખ-ગ-ઘ Ka, Kha, Ga, Gha (Soujanya Deepak Bapu)

ક – કહે છે કલેશ ન કરો
ખ – કહે છે ખરાબ ન કરો
ગ – કહે છે ગર્વ ન કરો
ઘ – કહે છે ઘમંડ ન કરો
ચ – કહે છે ચિંતા ન કરો
છ – કહે છે છળથી દૂર રહો
જ – કહે છે જવાબદારી નિભાવો
ઝ – કહે છે ઝઘડો ન કરો
ટ – કહે છે ટીકા ન કરો
ઠ – કહે છે ઠગાઇ ન કરો
ડ – કહે છે કયારેય ડરપોક ન બનો
ઢ – કહે છે કયારેય ‘ઢ’ ન બનો
ત– કહે છે બીજાને તુચ્છકારો નહીં
થ – કહે છે થાકો નહીં
દ – કહે છે દીલાવર બનો
ધ – કહે છે ધમાલ ન કરો
ન – કહે છે નમ્ર બનો
પ – કહે છે પ્રેમાળ બનો
ફ – કહે છે ફુલાઇ ન જાઓ
બ – કહે છે બગાડ ન કરો
ભ – કહે છે ભારરૂપ ન બનો
મ – કહે છે મધૂર બનો
ય – કહે છે યશસ્વી બનો
ર – કહે છે રાગ ન કરો
લ – કહે છે લોભી ન બનો
વ – કહે છે વેર ન રાખો
શ – કહે છે કોઇને શત્રુ ન માનો
સ – કહે છે હંમેશા સાચુ બોલો
ષ – કહે છે હંમેશા ષટ્કાયના જીવની રક્ષા કરો
હ – કહે છે હંમેશા હસતા રહો
ક્ષ – કહે છે ક્ષમા આપતા શીખો…! ♥♥
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સંત નાગેશ         संत नागेश           Sant Nagesh
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જાય ગુરુ-દેવ       जय गुरु-देव          Jay Guru-DevNagesh Best articles

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सोमवार, 9 मई 2016

શિવાજીનું હાલરડું

શિવાજીનું હાલરડું



આભમાં ઉગેલ ચાંદલો ને જીજીબાઈને આવ્યા બાળ
બાળુડા ને માત હિંચોળે
ઘણણણ ડુંગરા બોલે !
શિવાજીને નીંદરૂ ના’વે,
માતા જીજીબાઈ ઝૂલાવે.
પેટમાં પોઢીને સાંભળેલી બાળે રામ લખમણની વાત
માતાજીને મુખ જે દી થી,
ઊડી એની ઉંઘ તે દી થી…. શિવાજીને ….
પોઢજો રે મારા બાળ ! પોઢી લેજો પેટ ભરીને આજ
કાલે કાળા જુધ્ધ ખેલાશે
સુવાટાણું ક્યાંય ન રે’શે…. શિવાજીને ….
ધાવજો રે, મારા પેટ ! ધાવી લેજો ખૂબ ધ્રપીને આજ
રેશે નહીં રણ ઘેલુડા
ખાવા મુઠ્ઠી ધાનની વેળા …. શિવાજીને ….
પેરી ઓઢી લેજો પાતળા રે ! પીળા – લાલ પીરોજી ચીર
કાયા તારી લોહીમાં ના’શે
ઢાંકણ તે દી’ ઢાલનું થાશે …. શિવાજીને ….
ઘૂઘરા, ધાવણી પોપટ લાકડી ફેરવી લેજો આજ
તે દી તો હાથ રે’વાની
રાતી બંબોળ ભવાની …. શિવાજીને ….
લાલ કંકુ કેરા ચાંદલાને ભાલે તાણજો કેસર આડપ
તે દી તો સિંદોરિયા થાપા
છાતી માથે ઝીલવા, બાપા…. શિવાજીને ….
આજ માતા ચોડે ચૂમીયું રે ! બાળા ઝીલજો બેવડ ગાલ,
તે દી તારા મોઢડા માથે
ઘુંવાધાર તોપ મંડાશે. શિવાજીને ….
આજ માતાજીની ગોદમાં રે, તુંને હુંફ આવે આઠે પોર,
તે દી કાળી મેઘલી રાતે
વાયુ ટાઢા મોતના વાશે …. શિવાજીને ….
આજ માતા દેતી પાથરી રે કૂણાં ફૂલડા કેરી સેજ
તે દી તારી વીર પથારી
પાથરશે વીશ ભુજાળી …. શિવાજીને ….
આજ માતાજીને ખોબલે રે, તારા માથડાં ઝોલે જાય
તે દી તારે શિર ઓશીકાં
મેલાશે તીર બંધૂકા …. શિવાજીને ….
સૂઇ લેજે મારા કેસરી રે ! તારી હિંદવાણું જોવે વાટ
જાગી વે’લો આવ બાલુડા
માને હાથ ભેટ બાંધવા …. શિવાજીને ….
જાગી વે’લો આવજે વીરા
ટીલું માના લોહીનું લેવા.
શિવાજીને નીંદરૂ ના’વે
માતા જીજીબાઇ ઝૂલાવે.
બાળુડાને માત હિંચોળે, ઘણણણ ડુંગરા બોલે !
          – ઝવેરચંદ મેઘાણી



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ભજન સંગ્રહ

ભજન સંગ્રહ

વોહ સુરત કૈસી હોતી હૈ!
Jo Paida Dard Kar Deti,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai..
Kaleje Jakhm Kar Deti,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai..

Jinki Baki Adaao Se
Bhanvar Tirchi Nigaho se,
Pighal Jaate Hai Patthar Bhi,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai...

Najar Padte Hi Padte Hi,
Zara Si Der Me Yaaro,
Asar Aashiq Ko Kar Deti,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai...

Agar Takat Hai Unki to,
Asar ye mit Nahi Sakta,
Sitam Kar ke Satati Hai,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai...

"Laal" Ghar Ghar nahi hoti,
Bajaaro me nahi bikti*****,
Dhundhne Se Nahi Milti,
Woh Surat Kaisi Hoti Hai....

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बंदऊँ गुरु तव कमल पद, हे प्रभु 'मोहन' रूप।
शीघ्र उबारो नाथ अब, पड़ा अज्ञ भव-कूप॥

दृढ़ श्रद्धा विश्वास से, गुरु का कीजै ध्यान।
मोह मुक्त कर भक्ति का, गुरुवर दें वरदान॥

मन पावन हो ज्ञान से, धन की सदगति दान।
गुरु-सेवा, सत्संग से, मिले मुक्तिपथ धाम॥

ध्यान रखो गुरु चरन में, करो सकल निज कर्म।
स्वाति बूँद पपिहा तपै, घट परिहारिन मर्म॥

राम कथा की मित नहीं, कहें अनादि अनन्त।
तुलसी 'किंकर' रूप में, पूजत विद्वत संत॥

बाल्मीकि तुलसी भये, तुलसी 'किंकर राम'।
राम कथा बिन नहिं कटें, रोग खोट विश्राम॥

'गुरु किंकर' अपनाय कर, दीना जनम सुधर।
निश्चित अगले जन्म में, मिले राम का द्वार॥

बिनु गुरुकृपा न अघ नसहिं, मन न होय निष्काम।
काम-युक्त मन में कभी, बसहिं न 'किंकर-राम'॥

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કાળધર્મ ને સ્વભાવને જીતવો,

 કાળધર્મ ને સ્વભાવને જીતવો,
 રાખવો નહિ અંતરમાં ક્રોધ રે
 સમાનપણેથી સર્વેમાં વર્તવું,
 ને ટાળી દેવો મનનો વિરોધ રે ... કાળધર્મ.
 નિર્મળ થઈને કામને જીતવો,
 ને રાખવો અંતરમાં વૈરાગ રે,
 જગતના વૈભવને મિથ્યા જાણી,
 ને ટાળી દેવો દુબજાનો ડાઘ રે ... કાળધર્મ.
 આલોક પરલોકની આશા તજવી,
 ને રાખવું અભ્યાસમાં ધ્યાન રે,
 તરણા સમાન સહુ સિદ્ધિઓને ગણવી,
 ને મેલવું અંતરનું માન રે ... કાળધર્મ.
 ગુરુમુખી હોય તેણે એમ જ રહેવું,
 ને વર્તવું વચનની માંય રે,
 ગંગા સતી એમ બોલિયાં રે,
 એને નડે નહિ જગતમાં કાંઈ રે ... કાળધર્મ.

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મેદાનમાં જેણે મોરચો માંડ્યો ને

 મેદાનમાં જેણે મોરચો માંડ્યો ને
પકડ્યો વચનનો વિશ્વાસ રે, ચૌદ લોકમાં કોઈથી બીએ નહીં થઈ બેઠાં સદગુરુના દાસ રે ... મેદાનમાં સાન સદગુરુની જે નર સમજ્યો, તે અટકે નહીં માયા માંહ્ય રે, રંગરૂપમાં લપટાય નહીં જેને મળી ગઈ વચનની છાંય રે ... મેદાનમાં રહેણીકરણી એની અચળ કહીએ એ તો ડગે નહીંય જરાય રે, વચન સમજવામાં સદાય પરિપુર્ણ તેને કાળ કદી નવ ખાય રે ... મેદાનમાં સોઈ વચન સદગુરુજીના ઘરના, ગમ વિના ગોથાં ખાય રે, ગંગાસતી એમ બોલિયાં રે પાનબાઈ, વચન ન સમજ્યા નરકે જાય રે ... મેદાનમાં

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राम विना अवध ने न भावे
(ढाळ : श्याम विना व्रज सुनु लागे)


राम विना अवध ने न भावे , विरह सर्वे वहावे रे

राम विना अवध ने न भावे !


अवध आखु आंसु धारे , वनराई ने वाट पुकारे

शेरीये शेरीये साद संभारे , नर नारी मुख दर्शावे रे

राम विना अवध ने न भावे !


वेळा दशरथ ने वहमी घणी , कडवा वचन कैकयी भणी

कुळ लाज ने काज कठण धणी , वाला ने वन मा वळावे रे

राम विना अवध ने न भावे !


कौशल्या नु कैकयी नो मानी , झेर पीता जननी जाणी

पहोर आठ आंखे पाणी , उर मा आग दजावे रे

राम विना अवध ने न भावे !


भरत तो भ्राता विना जागे , वहमा घा रुदिया मा वागे

राज ने ताज कडवा लागे , नेणे नींदरा न आवे रे

राम विना अवध ने न भावे !


भर्या दरबार मा न्याय तोलावे , दिन दुखिया ना दल बोलावे

भूपत गुण तारा गावे , राम तोले कोय ना'वे रे

राम विना अवध ने न भावे !

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આજની ઘડી રળિયામણી

હો…. મારે આજની ઘડી રે રળિયામણી,
હાં રે ! મારો વાલો આવ્યાની વધામણી હોજી રે…..મારે.
હા જી રે તરિયા તોરણ તે બંધાવિયા,
મારા વાલાજીને મોતીડે વધાવિયા રે…. મારે.
હા જી રે લીલા, પીળા તે વાંસ વઢાવિયા,
મારા વાલાજીનો મંડપ રચાવિયો રે…. મારે.
હા જી રે ગંગા-જમનાના નીર મંગાવીએ,
મારા વાલાજીના ચરણ પખાળિયે રે… મારે.
હા જી રે સોનારૂપાની થાળી મંગાવીએ
માંહે ચમકતો દીવડો મેલાવિયે રે… મારે.
હા જી રે તન, મન, ધન, ઓવારિયે,
મારા વાલાજીની આરતી ઉતારીએ રે… મારે.
જી રે રસ વધ્યો છે અતિ મીઠડો,
મે’તા નરસિંહનો સ્વામી દીઠડો રે….મારે.

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સદગુરુ ભાણ કહે તું ભજીલે

સદગુરુ ભાણ કહે તું ભજીલે, 
તોતો ભારે કામ થાય.....

ભાણ કહે બોવ ભટકીશમાં, 
મથીલે અંતરમા..... 

ઠીક કરીને બેહીજા તોતો કરવુ પડે નો કાય..... 

કેમકે હંસ હતા ઈ હાલ્યા ગયા, 
જેમણે મરીને દિધા માગ... 

અભાગી જીવ અનેક છે કુટિલ હરદાના કાગ,
કુટિલ હરદાના કાગ સંગત કહો ક્યાં જય કરીયે.... 

વરતી વેરાગણ કરી મરત લોકમાં ફરીયે, 
જેદી શબ્દ બાર કુભેટશે તેદી લેશે ભક્તિ માં ભાગ, 

દાસસવો કહે હંસ હતા ઈ હાલ્યા ગયા જેમણે મરીને દિધા માગ..... 🙏🏻🌹

****************************************

શબ્દ એક શોધો.ત્યા સંહિતા નીકળે.
કુવો એક ખોદો. તો આખી સરિતા નીકળે...
જનક જેવા આવી હજુ જો હળ હાંકે.
તો આ ધરતી માં થી હજુ પણ સીતા નીકળે...
હજુ ધબકે છે ક્યાક લક્ષ્મણ રેખા..
કે રાવણ જેવા ત્યાં થી બીતા નીકળે....
છે કાલીદાસ અને ભોજ ના ખંડેર.
જો જરીક ખોતરો તો કવિતા નીકળે....
છે કૃષ્ણ ની વાંસળી ના એ કટકા.
કે હોઠે જો માંડો તો સુર-સરિતા નીકળે....
સાવ અલગ છે તાસીર આ ભૂમી ની.
કે મહાભારત વાવો ને ગીતા નીકળે....
દત્ત જેવા જોગી ની જો ફુંક લાગે તો..
હજુ ધુંણા તપ ના તપતા નીકળે.....
`દાદ'આમતો નગર છે સાવ અજાણ્યુ.
તોય કોક ખુણે ઓળખીતા અચુક નીકળે.....


****************************************

શબ્દ એક શોધું ત્યાં

                        આખી સંહિતા નીકળે

                કૂવો જયાં એક ખોદુ ત્યાં

                        આખી સરિતા નીકળે

                સાવ અલગ તાસીર છે

                        આ ભૂમિની

                અહીં મહાભારત વાવો

                        અને ગીતા નીકળે

                જનક જેવા આવીને

                        જો હજીએ હળને હાંકે

                તો હજીએ આ ધરતીમાંથી

                        સીતા નીકળે

                હજીએ ધબકે છે કયાંક

                        લક્ષ્મણની એ રેખા

                રાવણો પણ જયાંથી

                        બીતા બીતા નીકળે

****************************************

સત્સંગનો રસ ચાખ, પ્રાણી.
તું સત્સંગનો રસ ચાખ.

પ્રથમ લાગે તીખો ને કડવો,
પછી આંબા કેરી શાખ ... પ્રાણી, તું.

આ રે કાયાનો ગર્વ ન કીજે,
અંતે થવાની છે ખાખ. ... પ્રાણી, તું.

હસ્તિ ને ઘોડી, માલ ખજાના,
કાંઈ ન આવે સાથ. ... પ્રાણી, તું.

સત્સંગથી બે ઘડીમાં મુક્તિ,
વેદ પૂરે છે સાખ. ... પ્રાણી, તું.

બાઈ મીરાં કહે પ્રભુ ગિરિધરનાગર,
હરિચરણે ચિત્ત રાખ. ... પ્રાણી, તું.
****************************************

જનમ જે સંત ને આપે જનેતા એજ કહેવાયે
અગર શુરો અગર દાતા ગુણો જેના સકળ ગાયે
જનમ જે સંત ને....

ન જનમે વિર કે શુરો ન જનમે સંત ઉપકારી
નકામા ના ભલે જનમે સમજવી વાંજણી નારી
જનમ જે સંત ને....

કર્ણ કુંતા તણો જાયો બન્યા ભગવાન ભિખારી
કસોટી કર્ણ ની કીધી ખરેખર ધન્ય જણનારી
જનમ જે સંત ને....

પીતા ની ટેક ને ખાતીર ના લાગી દેહ પણ પ્યારી 
ધન્ય એ બાળ ચૈલયો ધન્ય સંગાવતી માઇ
જનમ જે સંત ને....

નયન થી નીર ટપકે છે પુત્ર નો પ્રેમ નિહાળી 
છતાં વૈરાગ પણ દિધો માત મેનાવતી માઇ
જનમ જે સંત ને....

સંનારી હોય તે સમજે હ્રદય ની વાત ને મારી
જનેતા ને ઉદર જનમયા ક્રિષ્ન ને રામ અવતારી
જનમ જે સંત ને....

જનેતા તોજ તુ જણજે સપુત નર સંત કે શાંણા
ન જનમે ચતુર ચદુ તો ભલે પેટે પળે પાંણા
જનમ જે સંત ને....
****************************************

કભી પ્યાસે કો પાની પિલાયા નહિ
 બાદ અમૃત પિલાને સે ક્યા ફાયદા
 કભી ગિરતે હુએ કો ઉઠાયા નહિ
 બાદ આંસુ બહાને સે ક્યા ફાયદા .
 મેં તો મંદિર ગયા, પૂજા-આરતી કી
 પૂજા કરતે હુએ યે ખયાલ આ ગયા
 કભી મા બાપ કી સેવા કી હી નહિ
 સિર્ફ પૂજા કે કરને સે ક્યા ફાયદા.
 …………………………………………..કભી પ્યાસે
 મેં તો સત્સંગ ગયા , ગુરુ વાણી સુની ,
 ગુરુ વાણી કો સુનકર ખયાલ આ ગયા
 જન્મ માનવ કા લેકે દયા ના કરી
 ફિર માનવ કેહલાને સે ક્યા ફાયદા.
 ………………………………………….કભી પ્યાસે
 મેં ને દાન કિયા , મેં ને જપ તપ કિયા
 દાન કરતે હૂએ યે ખયાલ આ ગયા
 કભી ભૂખે કો ભોજન ખિલાયા નહિ
 દાન લાખો કા કરને સે ક્યા ફાયદા.
 ………………………………………….કભી પ્યાસે
 ગંગા નહાને હરિધ્વાર કાશી ગયા
 ગંગા નહાતે હી મન મેં ખયાલ આ ગયા
 તન કો ધોયા મગર મન કો ધોયા નહિ
 ફિર ગંગા નહાને સે ક્યા ફાયદા
 …………………………………………..કભી પ્યાસે
 મૈ ને વેદ પઢે , મૈ ને શાસ્ત્ર પઢે
 શાસ્ત્ર પઢતે હૂએ યે ખયાલ આ ગયા
 મૈ ને જ્ઞાન હી કિસીકો બાટા નહિ
 ફિર જ્ઞાની કેહલાને સે ક્યા ફાયદા.
 ……………………………………………કભી પ્યાસે
 મા પિતા કે ચરણો મેં હી ચારો ધામ હૈ
 આજા આજા યહી મુક્તિ કા ધામ હૈ
 પિતા-માતા કી સેવા કી હી નહિ
 ફિર તીર્થો મેં જાને સે ક્યા ફાયદા.
 ……………………………………………કભી પ્યાસે
 કભી ગિરતે હૂએ કો ઉઠાયા નહિ
 બાદમે આંસુ બહાને સે ક્યા ફાયદા.

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જાય ગુરુદેવ 
(દિપક બાપુ)
સંત નાગેશ શર્મા 
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लेख ( ब्रह्म की खोज करने वाला प्रथम व्यक्ति)

लेख (ब्रह्म की खोज करने वाला प्रथम व्यक्ति)सौजन्य (दीपक बापू)


🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
                 ऋग्वेद का यह उद्घोष है कि ब्रह्म  एक है तथा इसे ब्रह्म ज्ञानी लोग विभिन्न नामो से पुकारते है। ब्रह्म का सबसे समीपवर्ती प्रियतम नाम ओम है। इसे प्रणवाक्षर भी कहा जाता है। सनातन धर्म में प्रयुक्त सभी मंत्र ओम से ही प्रारम्भ होते है क्योकि सभी मंत्र  उसी एक सत्य ब्रह्म के लिए ही है अन्य किसी के लिए भी नहीं। क्योकि वही एक नित्य है सत्य है सनातन है। वेदो में तथा पुराणो में विभिन्न नामो से उसी एक ब्रह्म का वर्णन है। ब्रह्म का नाम इनमे से कोई भी हो सकता है। हम उसका वर्णन इनमे से किसी भी नाम से कर सकते है। ब्रह्म को किसी एक पुस्तक किसी एक शब्द किसी एक नाम किसी एक गुण किसी एक स्थान किसी एक व्यक्ति तक सिमित नहीं किया जा सकता है। ब्रह्म स्वयं में अनंत है. उसके अनंत नाम है। उसके अनंत गुण है।  उसका परिमाप अनंत है। उसकी अनंत प्रकार से प्रार्थना किया जा सकता है। उसकेअनंत प्रकार के रूप है। इन सबमे से हम किसी भी रूप में ब्रह्म कि पूजा कर सकते है।

यथा नद्याः सरोवराः प्रवाहतः गच्छन्ति सागरम्।
सर्वदेव नमस्कारम् ब्रह्मैकं प्रति गच्छति ।।
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             कुछ व्यक्तियों का यह मत है कि ईश्वर निराकार है। तथा कुछ की यह मान्यता है कि ब्रह्म साकार है। अगर ब्रह्म साकार है तो इसमें मानव अपनी अपनी धारणा बुद्धि के अनुसार ब्रह्म के विभिन्न रूपों की कल्पना कर सकता है किन्तु अगर ब्रह्म निराकार है तो निराकार में मानव कि बुद्धि काम करना बंद कर देती है और वह और आगे तक कल्पना करने में असमर्थ हो जाता है और उसके मन में यही बात घर कर जाती है कि ब्रह्म का कोई भी स्वरुप नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे कि किसी को अँधेरे में पूछा जाय कि अमुक वस्तु कैसी है तो वह यही कहेगा कि कोई आकर नहीं है। अगर आपको ऐसा प्रतीत होता है तो आपको यह समझ लेना चाहिए कि आप अभी अंधकार के आधिपत्य में है आपके ज्ञान चक्षुओ को प्रकाश की आवश्यकता है जो कि अभी प्राप्त नहीं हुआ है। आपको अभी प्रयास करने कि आवश्यकता है। जैसा कि आपको ज्ञात है कि  देखने के लिए केवल आँखे ही पर्याप्त नहीं है ज्ञान चक्षु कि भी आवश्यक है। आँखों से केवल प्रकाश में देखना सम्भव है किन्तु अगर आपने किसी चीज़ को नहीं देखा है और उसके बारे में आपको ज्ञात भी नहीं है तो उस परिस्थिति में उसे ज्ञान चक्षु से ही देखा जा सकता है। मानव के साथ यह समस्या है कि  जो भी वस्तु उसकी आँखों में प्रतिबिंबित न हो उसको देखना तथा समझना असम्भव या कठिन है। जैसा कि अगर वैज्ञानिको को अगर मंगल तक पहुचना है तब वे विभिन्न प्रकार के गणितीय भौतिक तथा रासायनिक परिस्थितियों का अध्ययन करते है जो कि केवल ज्ञान चक्षुओ से ही सम्भव होता है। अध्ययन के पश्चात वे निष्कर्ष पर पहुंच जाते है तथा मंगल तक पहुचने में सफल हो जाते है। जब वे मंगल पर पहुँचते है तभी यह देखना सम्भव हो पता है कि वह कैसा है वह का वातावरण कैसा है आदि आदि।
          जब तक मंगल ग्रह पर हम नहीं पंहुच जाते तब तक मंगल ग्रह हमारे लिए निराकार है जब हम उसपर पहुंच जाते है तब वह हमारे लिए साकार हो जाता है। ठीक इसी प्रकार अगर हम यह कहते है कि यह वस्तु निराकार है इसका अर्थ यह है कि हमें उसका स्वरुप पता नहीं है या तो हमारी आँखों के पास उतनी छमता नहीं है कि हम उसे देख सके। भौतिक जीवन में हमारे सपने भी निराकार होते है उसे हम अपने ज्ञान चक्षुओ से देखते है तथा जब उन लक्ष्यों कि प्राप्ति हमें हो जाती है तब हम कहते है कि हमारे सपने साकार हो गए।  अतः यह सिद्ध होता है कि हमारे सपने निराकार होते है और वे साकार हो सकते है। 

             ठीक इसी प्रकार ब्रह्म कि कल्पना जब हम करते है तो वह भी हमें निराकार प्रतीत होतेही और हम उसको प्राप्त करने या प्राप्त होने का प्रयास किये बिना ही यह धारणा बना लेते है कि वह निराकार है। अतः यदि आप यह कहते है कि ब्रह्म निराकार है तो यह स्पष्ट है कि आप अभी ब्रह्म कि कल्पना कर रहे है आप उसके साक्षात्कार के लिए प्रयास नहीं कर रहे है और आपने अभी उसके स्वरुप का दर्शन  भी नहीं किया है। अतः यह स्पष्ट है कि निराकार ब्रह्म की प्रथम अवस्था है तथा साकार ही उसकी अंतिम अवस्था है.
        
            वेदो में भी ठीक इसी प्रक्रिया का वर्णन है। प्रारम्भ में वेद यह कहता है कि ब्रह्म कि कोई प्रतिमा नहीं है तथा उसके कोई स्वरुप नहीं है किन्तु जब ऋषि ज्ञान तथा योग के द्वारा ब्रह्म का दर्शन कर लेता है तब वह कहता है कि ब्रह्म अनंत रूपों वाला है उसके अनंत गुण है वह स्वयं में अनंत है उसके प्रार्थना तथा प्रशंसा के अनेक प्रकार हो सकते है। इस प्रकार अनेक ऋषियों ने ब्रह्म का साक्षात्कार किया तथा अपने अपने ज्ञान के अनुसार रेखाचित्रों द्वारा भी ब्रह्म के स्वरुप को समझने का प्रयास किया। यह विभिन्नता ठीक उसी प्रकार है कि यदि किसी वस्तु को १० विभिन्न कलाकारों को दिखाया जाय तथा यह कहा जाय कि वे अलग अलग कमरो में बैठ कर उसके रेखाचित्र बनाये तो यह निश्चित है कि उन सभी के रेखाचित्र एक दूसरे से भिन्न होंगे।  जबकि वास्तविकता यह है कि वे सभी रेखाचित्र एक ही वस्तु के है। 
            धर्मिक पुस्तको को ही लीजिये कोई व्यक्ति उन्हें पढ़कर शांतिमार्गी हो जाता है तो कोई उसे ही पढ़कर हिंसक हो जाता है तो कोई अहिंसक हो जाता है कोई वसुधैव् कटुम्बकम कहता है कोई सभी मान्यताओ का सामान  आदर करता है कोई अपने से सभी बड़ो को प्रणाम करने कि बात करता है तो कोई केवल ब्रह्म को ही प्रणाम करने कि बात करता है। तो कोई केवल अपने ही मार्ग को  उत्तम तथा अन्य के मार्ग को गलत बताता है। कोई कोई तो अपने को बड़ा तथा दूसरे को छोटा बताता है।  यह ठीक वैसे ही है जैसा कि अगर दो व्यक्तियों को कुछ दूरी पर स्थित दो सामान ऊंचाई वाले भवनो पर खड़ा कराया जाय और पूछा जाय कि सामने वाले भवन कि ऊंचाई कितनी है तो वे दोनों सामने वाले भवन को एक दूसरे से छोटा कहेंगे। 
     किन्तु सभी लोग इस बात में एकमत है कि ब्रह्म एक है ईश्वर एक है । अगर वह एक है तो विभिन्न प्रकार कि मान्यताये और धारणाये क्यों? यह इसलिए कि सबकी बुद्धि अलग अलग है तथा सभी अपनी अपनी समझ के अनुसार ब्रह्म के बारे में बता रहे है। 

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 ऋग्वेद कहता है -
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एकम सत विप्राः वहुधा वदन्ति।।
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          ब्रह्म सत्य है और उसे प्राप्त करना विज्ञान से सम्भव है। जैसे भौतिक गुण के लिए  भौतिक विज्ञान होता है  रासायनिक गुण के लिए रसायन विज्ञान होता है ठीक उसी प्रकार  ब्रह्म के लिए ब्रह्म विज्ञान या योग विज्ञान है। जिसमे परिकल्पनाएं है मार्ग बताय गए है किन्तु ब्रह्म का साक्षात्कार तो इस बात पर निर्भर करता है कि आप उस मार्ग पर कितना सही चले है तथा कितना प्रयास किया है. यह ठीक उसी प्रकार है कि प्रयोगशाला में सभी लोग एक ही प्रयोग करते है किन्तु विभिन्न प्रकार कि त्रुटियाँ  होने के कारन उनके परिणाम अलग अलग तथा कभी कभी गलत भी होते है।


         अगर आप ब्रह्म को निराकार कहते है तो इसे यह समझा जायेगा कि आपने केवल  सुना है कि ब्रह्म होता है किन्तु देखा नहीं है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति इस बात को लेकर दृढ है कि ब्रह्म केवल निराकार होता है। आप अभी ब्रह्म में विस्वास कि प्रथम सोपान पर खड़े है। जैसे जैसे आप ब्रह्म के ओर उन्मुख और समीप होते जाते है वैसे वैसे ही ब्रह्म आपको निराकार से साकार रूप में प्रतीत होने लगता है और अंत में आपको ब्रह्म के साकार रूप के दर्शन होते है।
 
               मैं यह कहता हूँ कि आप ब्रह्म प्राप्ति के लिए किसी विद्वान के पास जाइए। आप स्वाध्याय कीजिये । अगर आपको कोई विषय वस्तु नहीं समझ में आये तो आप अन्य पुस्तको से सहायता ले सकते है। जब स्वाध्याय से आपके पास धर्म या ब्रह्म का एक प्रतिबिम्ब बन जाय तब आप किसी विषय विशेषज्ञ के पास जा सकते है। अगर आप बिना स्वाध्याय किये ही किसी विशेषज्ञ के पास जायेंगे तो आपको अंध भक्त होने कि संभावना अधिक होगी और इस अवस्था में आपको अगले के तर्कों को पूर्णतया मानना होगा। अतः अंध भक्त होने से बचने के लिए आप स्वाध्याय करने के बाद ही किसी के पास ब्रह्म चर्चा के लिए जाय।
            सर्दी के मौसम में जब कुहासा होता है उस समय आपको कुहासे से आगे कुछ नहीं  दिखाई देता है किन्तु जब आप वस्तु के समीप जाते है तभी आपको उस वस्तु के साकार होने का बोध होता है। किन्तु यह तब भी थोड़ा धुंधला ही रहता है जब कुहासा पूर्णतया समाप्त हो जाता है तब आपको वह वस्तु साफ दिखाई देने लगती है। ठीक इसी प्रकार ब्रह्म साकार है किन्तु ज्ञान नहीं होने के कारन हम यह मैंने को  विवस है कि ब्रह्म निराकार है। अतः अपने ज्ञान को विकसित कीजिये तथा ईश्वर के साकार रूप का साक्षात्कार कीजिये।  कभी भी लोगो के बहकावे में मत आये कि आज तक भगवन को किसने देखा है आदि आदि।
आप उनसे यह पूछे कि आज तक मंगल पर कौन गया है? किसी आविष्कार के बारे में पूछे कि जब यह पहले नहीं हुआ था तो आज कैसे हो गया? अगर आपको भी ऐसा लगता है कि ब्रह्म निराकार है तो आप ब्रह्म को खोजने वाले प्रथम व्यक्ति का स्थान प्राप्त कर सकते है। क्यों इस उपलब्धि को आप हासिल करना नहीं चाहते?
          प्राचीन कल में वेद पुराण हुआ करते थे 
पुराणो में बोध कथा के माध्यम से वेदो में कही गयी बातो को बड़े ही सरल तथा रोचक तरीके से समझाया गया है। कुछ विद्वान तथा विशेषतया आर्य समाजी विद्वान इसे काल्पनिक बताते है अगर यह काल्पनिक हो भी तो इसमें क्या बुराई है? अगर ब्रह्म के बारे में हम दुसरो से सुनकर ही कल्पना करते है बाद में उसे प्राप्त होने या प्रत्यक्ष साक्षात्कार के लिए प्रयास करते है। उसमे से हमें कहानिया ग्रहण करने की अपेक्षा उसमे उपस्थित भगवानुवाच तथा इश्वरोवाच पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ब्रह्म की वाणी ही वेद वाणी है। पुराणो में तो केवल यही समझने का प्रयास किया गया है की किसने क्या कर्म किया तो उसे क्या फल मिला? पुराणो को पढ़ने से मना करना उपयुक्त नहीं है। वेदो के माध्यम से ब्रह्म के उपदेश को समझना बहुत ही कठिन है। पुराणो के माध्यम से समझना बहुत ही आसान है। यह कहकर मैं पुराणो को किसी विद्वान से सुनने का समर्थन करता हूँ। कृपया पुराणो को त्यागे नहीं। उसमे कुछ प्रछेप हो सकते है जिसे विद्वानो की सर्व सम्मति से सुधारने की महती आवश्यकता है जिससे विश्व भर के मानव मात्र का कल्याण हो सके। पुराणो में कुछ अश्लील शब्द  मिलते है जिसपर कुछ विद्वानो की असहमति हो सकती है। इसे त्यागने के बजाय सुधारने की महती आवश्यकता है। आज आवश्यकता है पुनः एक नए वेदव्यास की जो पुनः इन वेदो तथा पुराणो से प्रक्षेपों को हटाकर उनके वास्तविक रूप को मानव मात्र के सम्मुख रख सके जिससे मानव मात्र का कल्याण सुरक्षित हो। अगर आप की पकड़ वेदो तथा पुराणो पर अधिक हो तो कृपया एक समूह बनाये तथा इस पावन जीर्णोद्धार में अपना अमूल्य योगदान करे। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब लोग अपने बच्चो को यह पढ़ाएंगे की प्राचीन काल में वेद पुराण हुआ करते थे. वेदो को ईश्वर ने लिखा तथा पुराणो को ब्राह्मणो ने लिखा कृपया ऐसी भ्रान्तिया न फैलाये। इससे समाज में भेद भाव पैदा हो रहा है। सबको एकजुट करने का प्रयास करे। अगर सम्भव हो तो सबके साथ मिलकर किसी एक ही मत का प्रचार करे। सोशल मीडिया में सभी लोग अपना अपना प्रचार कर रहे है। सभी अपने अपने धर्म गुरु का ही प्रचार कर रहे है धर्म का नहीं। यह भी एक प्रकार का पाखंड है इससे भी बचे। पाखंडी नहीं धार्मिक बने। केवल सनातन धर्म का ही प्रचार प्रसार करें।

सनातन धर्म की जय हो!




नोट: प्रस्तुत लेख व्हाट्सप्प ग्रुप के सौजन्य से दीपक बापू द्वारा भेजे हुए लेख से बिना किसी रूपांतरण के ज्यों की त्यों ली गयी है! यदि किसी को कोई तकलीफ हो तो वह कमेंट में अपनी राय लिख सकता है!
धन्यवाद  




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मंगलवार, 3 मई 2016

थोड़ी सी ज्ञान की बात भाग ३

थोड़ी सी ज्ञान की बात भाग ३

शान्ति

                    बोलना, सुनना, सोचना, समझना एक क्षण के लिए नज़र भर घूमा ले इस टॉपिक पे तो लोगो को कितना आसान लगता है! इन-फैक्ट लोग तो सोचते है वही घिसी पिटी लाइन होगी सब तरह से शांति मोक्ष पूजा-पाठ वगेरा वगेरा!   सही बात है भाई मैंने तो पहले भी कहा है की हर किसी को बोलने का पूरा हक़ हमारे संविधान ने दिया ही है! तो आप बोल सकते है! ठीक उसी प्रकार एक और संविधान है और वह संविधान है  उस ऊपर वाले का जिसमे सभी को वह सामान ही समझता है! परन्तु काबिलियत के हिसाब से सही काम देता है!  उसने सभी को शांति से जीवन व्यतीत करने का सामान हक़ दिया है! और इस शांति मार्ग में जाने का सभी को सामान अधिकार है! परन्तु आखिर शांति होती है क्या!   शांति शांति सब करते है शांति है क्या??????????

                  जी हाँ सब बोलते है! "शांति रखो कोई बोलता है शांति से काम लो! शांति बनाए रखो!"

            आखिर है क्या ये शांति किसको बनाने रखने काम लेने की बात हो रही है! हर जगह इसका अर्थ अलग क्यों जान पड रहा है! आध्यात्मिक में शांति कुछ अलग लगती है! भीड़ में शांति कुछ अलग लगती है! शोर में कुछ अलग लगती है! आखिर ऐसा क्यों होता है! ये शांति है क्या! और ये अलग अलग क्यों लग रही है इसे कोई एक रूप में ही होना चाहिए ना! क्योंकि ले-देके ये तो जुड़ी है मन से फिर दूसरी बातें इसमें कहा से आई!

              जी हाँ सही सोचा है आप ने शांति मन की ही है और मन को ही मनाना है शांत होने के लिए और इन सभी के लिए अलग अलग तरह के प्रयोजन भी है! कोई कुछ अलग ढंग से मनाता है कोई अलग ढंग से मनाता है! पर सब से पहले आज हम गौर करेंगे की अशांति है किस बात की!

           किसी को बी ही देख लो सभी को किसी न किसी प्रकार की कोई न कोई अशांति तो है ही! कोई शादी के लिए परेशान है! कोई बच्चे के लिए परेशान है! कोई बच्चे से परेशान है! किसी की परेशानी बीवी से है! किसी की पति से है! किसी की सासु माँ परेशान कर रही है, घर में अशांति का माहौल बन हुआ है! तो कोई सास बेचारी अपनी बहु से परेशान है! किसी का धंधे में परेशानी है! किसी को घर में परेशानी है! पैसे, रिश्ते, दोस्त, कारोबार, प्यार, माया, मोह हर तरफ से आदमी घिरा हुआ है और हर तरफ से परेशान ही है! और मज़े की बात ये है की इन परेशानियों का हल भी इन्ही में है! आखिर परेशान हो क्यों जाता है आदमी!!? परेशानियां आती कहा से है? इन परेशानियों को दावत दी किसने है!

               कुछ समय पहले एक सर्वे हुआ था, यूँ तो इस तरह के सर्वे हमेशा होते है परन्तु ये सर्वे अभी अभी पिछले साल का है जिसे अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेटागन ने किया था! इसमें इन्होंने निष्कर्ष निकाला की पूरी दुनिया में आदमी की सब से बड़ी प्रॉब्लम आज की तारीख में जो बन चुकी है वह है स्ट्रेस, तनाव, खिंचाव!!!! और ये इतना बढ़ रहा है की आने वाले २ - ३ साल में तो हर व्यक्ति तक़रीबन इसकी चपेट में होगा! बड़ा बूढ़ा बच्चा महिला कोई भी हो कोई भी! इससे नहीं बचेगा! ये हमारे समाज का बहुत बड़ा रोग ही बन गया है! पिछले कुछ दिनों से कई लोग मुझ से पूछ रहे थे की आप थोड़ा मन की शांति के बारे में लिखिए या बोलिए क्योंकि तनाव आज की तारीख में बहुत बढ़ गया है! आये दिन लोग खुदखुशी कर रहे है! रिश्तों में दरारे पड़ती जा रही है! कई कारोबार टूटते जा रहे है! आखिर ऐसा क्यों हो रहा है! गलती कहा हो जा रही है! तो मैंने भी सोचा की चलो मौका है तो आज इसी के बारे में लिखते है!

       स्ट्रेस, तनाव कुछ भी इसके बारे में बोलने के पहले कुछ लोगो की तरफ नज़र घूमा लेते है! एल्विस प्रेस्ली, माइकल जैक्सन, अभी अभी प्रत्युषा बनर्जी, उनके आलावा जिया खान! और न जाने कितने आम लोग है जिन्होंने आत्महत्या कर ली है! आये दिन न्यूज़ पेपर में पढ़ने मिलता रहता ही है! की महाराष्ट्र के उत्तर प्रदेश के पंजाब के किसान ने आत्महत्या की और भी लोग है प्यार में पड़-पड़ के पैसे के चक्कर में आत्महत्या करते ही रहते है! क्यों ऐसा हो जाता है! आखिर क्या कमी थी एल्विस को माइकल को प्रत्युषा को?? तो जवाब होगा की ये अकेले पड़ गए! ये रिश्ते संभाल नहीं पाये! इन्होंने हक़ीक़त में ऐसा किया क्या तो इसका जवाब है "सिद्धांत"
       
               "सिद्धांत" व्यक्ति के जीवन में सिद्धांत का होना बहुत ज़रुरी है और सिद्धांत के बिना इस दुनिया में कोई चीज़ टिक नहीं सकती है! ट्रैन के बारे में हम सभी जानते है! अगर हमारे रेल मंत्री ये सोचे की मैं चलती ट्रैन के आगे खड़ा हो जाऊ तो मुझे कुछ नहीं होगा क्योंकि मैं रेल मंत्री हूँ, रेलवे का एक तरह से मालिक ही हूँ मैं! मेरे इशारे पे ही ट्रैन चलती है! उनकी दिशा उनका विकास सब मेरे हाथ में है! तो क्या चलेगा!?? क्या चलती ट्रैन के सामने रेल मंत्री आ के खड़े हो जायेंगे एकदम अचानक, एकदम पास में! तो क्या ट्रैन उनके ऊपर से उड़ के चली जाएगी?? क्या ट्रैन उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी!?? नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है! क्योंकि ट्रैन को पता नहीं है की रेल मंत्री कौन है! उसका सिद्धांत है, उसका नियम है मोटरमैन के बताये हुए स्पीड में दौड़ना! पटरी जहां तक सही है! वह उसपे सही तरीके से दौड़ेगी! बिच में जो भी आएगा उसके साथ उसका टकराव निश्चिन्त ही है! मोटरमैन भी इसमें कुछ नहीं कर पाएगा क्योंकि! रेल का एक सिद्धांत है गति! और गति पे रोक इतना आसान नहीं है इसीलिए अचानक आई रुकावटों के साथ में टकराने पे सिद्धांत के हिसाब से नुकसान तो होगा ही होगा! और रेलमंत्री भी अपने आप को नुकसान पहुंचा लेंगे!

          रिलायंस एनर्जी के मालिक "श्री मान अनिल अंबानी" अगर वह सोचे की मैं इलेक्ट्रिसिटी का मालिक हूँ और सॉकेट में हाथ डालने पे मुझे करंट, शॉक नहीं लगेगा तो क्या ये संभव है! इलेक्ट्रिसिटी करेंट का काम जो है वह है! वह किसीको नहीं जानती है! बटन दबाया तो करेंट फैलेगी ही फैलेगी उसको इस बात से लेना देना है ही नहीं की हाथ डालने वाला कोई बच्चा है या बूढ़ा है या खुद इलेक्ट्रिक कंपनी के इतने बड़े मालिक है! उसको कोई फर्क नहीं पड़ता है! क्या लगता है आप को फर्क पड़ेगा!??? जी हाँ नहीं पड़ेगा! वह तो अपने सिद्धांत से बिलकुल नहीं चुकेगा! और सामने भले ही इलेक्ट्रिक कंपनी के मालिक हो वह उन्हें भी झटका देगी ही देगी! इसीलिए कहा जाता है की जीवन काल में सिद्धांत के साथ कभी भी खेल नहीं खेलना चाहिए! सिद्धांत के साथ खेल खेलोगे तो नुकसान उठाना पड़ेगा ही पड़ेगा! और ये नुकसान सिर्फ आप का ही नहीं आप के परिवार का आप के दूसरे चाहने वालो का भी हो सकता है! इसीलिए लाइफ में सिद्धांत को नहीं चूकना चाहिए! सिद्धांत के साथ में चूक हुई की आप तनाव में आएंगे ही आएंगे!
                  सिद्धांत कारोबार में, परिवार में, समाज में, देश में हर जगह आप को आप की स्थिति नियत्रण में रखने सीखता है सिद्धांत ही आप को ऊपर की और उठाता है! जितने भी भगवान  हो गए वह सभी एक सिद्धांत के साथ ही बड़े हुए है उनके रनिंग पीरियड में मतलब जब वह थे तब सभी उन्हें भगवान् माने ऐसा नहीं था परन्तु उन्होंने सिद्धांत नहीं छोड़ा अपनी निति अपने नियम को नहीं बदला और सही दिशा में अपने आप को आगे किया जिसके कारन वह पूज्यनीय हुए और भगवान हो गए!

                  एल्विस प्रेस्ली के साथ में हम आज मीरा-बाई को जोड़ के देखते है! पहले तो बता दो ये कहानी मैंने नहीं बनायीं है कही सुनी थी पर इतनी अच्छी है की आप के साथ शेयर कर रहा हूँ! हाँ तो जैसा की मैंने कहा एल्विस को पहले तो जान लेते है! एल्विस ७० के दशक में सबसे बड़े रॉकस्टार थे माइकल जैक्सन की ही तरह! २१ साल की उम्र में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया था वह शायद ही जल्दी कोई कर पाये! लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते थे उनके कॉन्सर्ट में भीड़ का को जमावड़ा होता था वह देखने लायक होता था! एल्विस परफॉरमेंस के दौरान जब अपनी जैकेट को उतार के लोगो की तरफ फेंकते थे तो लोग उसे चीथड़े चीथड़े कर देते थे! और उन टुकड़ो को भी लोग संभल के रखते ताकि वह उनकी यादि बन सके की हाँ हमने एल्विस के लाइव शो को देखा है! प्रसाद की तरह लोग उनके चिथड़ों को सम्भाल के ले जाते थे!
         
                   जब सुबह सुबह एल्विस जागने के बाद अपनी बालकनी में आते थे तो निचे मानवों का बड़ा सा झुंड उनके दर्शन के लिए खड़ा होता था! एल्विस अपने प्राइवेट जेट से सफर करते थे उनकी अपनी लिमोज़ीन कार थी जिसपे हीरा जड़ित था! हीरा!!!! सोचिये ७० के दशक में खुद की प्राइवेट जेट हीरे जड़ित लिमोज़ीन कार और ५०० मिलियन डॉलर की संपत्ति के मालिक और तो और एक बहुत बड़े पैमाने पे उनके नाम से प्रोडक्ट्स बिकते थे आज भी मार्किट में एल्विस के नाम से ७०+ प्रोडक्ट्स मौजूद है!

              अब आप सोच रहे होंगे ऐसे आदमी के साथ में मीरा बाई की कोई गिनती बैठती ही नहीं है क्योंकि मीरा बाई का कोई कॉन्सर्ट नहीं होता था वह बांके बिहारी के मंदिर के बाहर बैठ के भजन गाती थी! और सुनने के लिए २ ४ आदमी होते या वह भी नहीं होते थे! वह खुद राजशाही परिवार से थी पर उन्होंने सब कुछ धन दौलत वैभव संपत्ति को त्याग कर के रख दिया था सादे कपड़े में हरी भजती रहती थी! उन्हें कही जाना होता तो वह पैदल चल के जाती उस समय तो जेट या कार तो थे ही नहीं! तो ऐसे में मीरा बाई को हम एल्विस के साथ में कैसे जोड़े!????

            ३३ बरस की उम्र में एल्विस ने अपने प्राणो को त्याग दिया था! उन्होंने अपघात किया आत्महत्या! ऐसा कहा जाता था की जीसस के बाद में अगर कोई व्यक्ति अपने पहले नाम से प्रसिद्द हुआ है तो वह दूसरे व्यक्ति थे एल्विस! एक बार एल्विस अपने एक कम्पोजीशन पे काम कर रहे थे तो उनके सेक्रेटरी ने उनसे पुछा की आप को कैसा लग रहा है! उन्होंने अपने दोनों हाथ पियानो में से निचे लिए और कहा "अकेला" एक दम अकेला
आखिर क्यों जिसके कॉन्सर्ट में हजारो लोग आ रहे है! उसको अकेलापन क्यों सता रहा था! सुबह उठते ही जिसके घर के निचे भारी भीड़ उसका इंतजार करती थी और वह अकेलेपन का अनुभव कर रहा था और वह भी इतना अकेलापन की उसको खुदखुशी करनी पड़ गयी!

         मीराबाई के लिए तो खुदखुशी शब्द  भी अपराध के सामान था! अकेले रहने पे भी उन्होंने भजन गया की "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो"! सब कुछ छोड़ के भी उन्हें किसी अकेलेपन का एहसास ही नहीं था! मीराबाई चली गयी उन्होंने कोई मान या सम्मान की इच्छा नहीं जताई पर आज उनके एक एक लाइन पे लोग पीएचडी कर रहे हैं उनके कारन कई घर पल रहे है! उनके ऊपर रिसर्च कर के कितनो की आजीविका चल रही है! आखिर फेर पड़ा कहा!??? ऐसा क्या था मीरा बाई के पास जो एल्विस के पास न हो पाया वह थी मन की शांति मीरा बाई को वह शांति भक्ति में मिली! मैंने पहले ही कहा था लोग अपने अपने हिसाब से लगे हुए है! ढूंढ रहे है! पर पहुंच नहीं पाते है!

           बहुत से लोग अपने टाइम को बराबर से मैनेज नहीं कर पाते है वह समय को सही तरीके से बाँट नहीं पाते है और जब ये समय की कमी उन्हें खलने लगती है तब तनाव उनके जीवन में अपनी जगह बनाने लगता है! समय को सही तरीके से बाँटना चाहिए! घर के लिए, दोस्तों के लिए, काम के लिए, अपने खुद के लिए ये सब समय में सही तरीके से अगर बटा रहेगा तो आप को तनाव का सामना नहीं करना पड़ेगा और अगर करना पड़ा तो भी वह मैनेज करने योग्य रहेगा!

        समय आप का है और वह कितना मूल्यवान है ये आप लोगो को अच्छी तरह से मालूम है! इसीलिए उसकी सही तरीके से देखभाल करे और सदुपयोग में लाये और समय के दुरुपयोग से बचे! क्योंकि समय का सही मूल्यांकन नहीं कर पाना ही तनाव का निमंत्रण है! इसे उदाहरण के तौर पे समझते है!
     
                       हम पैसों के मोह में ज्यादातर फंसे हुए ही है! और थोड़ा सा पैसा अपने पास आते ही थोड़ा अकड़ जाते है! बच्चों को समय नहीं देते है और उन्हें पढ़ाई के नाम पे अलग अलग तरह के कोचिंग क्लास, और दूसरे जगह पे भेजते है! कभी भी हम उसके पीछे अपना समय नहीं डालते है ये सोच के की हमने हमारा काम सही किया है! हमने पैसा भर दिया है हमारा काम हो गया! पर क्या ये लाभ देता है! आप के पैसा भर देने से क्या उसे वह ज्ञान, वह अनुभव मिल जाता है! नहीं बिलकुल नहीं मिलता है! यदि आप उसे अपना समय देते तो शायद वह मिल सकता था! उसमे आप के संस्कार पड़ सकते थे पर आप समय देते ही नहीं और यही आगे चल के कारन बनता है आप की संतान में आई हुयी बदलाव का! वह आप को नज़र अंदाज़ करने लगता है! और आप के अंदर तनाव उत्पन्न होना शुरू हो जाता है जिसके कारन आप का तो बुरा होता है! आप के परिवार का भी बुरा होता है! आप के कारोबार पे भी इसका असर पड़ता है! आखिर क्यों ऐसा हुआ क्या इसको दोबारा बताने की जरुरत है आप को?? नहीं क्यों की आप जानते है आप समझदार है बस थोड़ा सा अंजान थे कर के आप ने इस बात को अहमियत नहीं दी! तो आगे से इसे अहमियत दीजिए! ना सिर्फ अपने बच्चों के लिए बल्कि अपने बच्चों के बच्चों के लिए भी आप का समय बहुत मूल्यवान है!

                      समय आप के लिए बहुत महत्व रखता है मैंने पहले भी एक जमींदार की कहानी इसके पहले के लेख में बताई थी की कैसे समय ने उसे खोखला बन दिया वह समय पे नहीं उठने के कारन अपने सभी कारोबार को समाप्ति की और लेके जा चूका था फॉर डिटेल्स चेक
http://santnagesh.blogspot.in/2016/04/blog-post_9.html 
            यहाँ उस कहानी में आप देख सकते है की कैसे उसने अपने समय के सही उपयोग से दोबारा वही मुकाम हासिल किया अपितु उससे बड़ा मुकाम हासिल किया तो कहने का मर्म सिर्फ इतना है की समय का सही इस्तेमाल आपको कारोबार में भी फायदा देता है! परन्तु सही समय पर नहीं किया गया काम तनाव का निमंत्रण है!             समय किसे देना है? कब देना है? और कैसे देना है? ये तीन बातें हमेशा ध्यान में रखिये! क्योंकि आप के समय की कीमत बहुत है! उसका सही इस्तेमाल ही आप को आगे ले के जायेगा!

              हम अक्सर अपने परिवार को समय नहीं देते है! जिसके कारन हमारा परिवार हमसे दूर हो जाता है नाराज़ हो जाता है! हम उनके लिए सब कुछ कर के भी नदारद ही रहते है! इसीलिए परिवार के लिए मेहनत तो करनी ही है परन्तु उसे सही ढंग से समय भी देना है! क्योंकि कई बातें है जो समय देने से स्वयं ही सुलझ जाती है! "कम्युनिकेशन गैप" आज की जेनरेशन का बहुत ही उम्दा किस्म का अपना ही प्रॉब्लम है! उन्हें  लगता है की पेरेंट्स उन्हें नहीं समझ सकते! पेरेंट्स को  लगता है की उनके बच्चे अभी छोटे ही है! वह नहीं समझ सकते!
दोनों एक दूसरे से बिना बात किये ही अपने अपने निष्कर्ष निकाल के बैठ जाते है और नतीजा! हम सब देख ही रहे है! आये दिन कुछ न कुछ समाचार में आता रहता है! हम अक्सर कई सारी बातें छुपाते है! उसको डिसकस नहीं करते है! मन में एक सोच बना लेते है की कैसे कहे! उदाहरण के तौर पे देखने जाए तो जैसे की कोई अश्लील वस्तु का बच्चे के बैग में मिलना! इसके लिए उसको तुरंत हम या तो भूलने की एक्टिंग करने लगते है! या तो उसे मारते है! सही है आप मैं नहीं कहता हूँ की उसे बढ़ावा दो क्योंकि ये गलत है! पर क्या आप ने सोचा की ऐसा क्यों हुआ! आखिर उसने ये स्टेप क्यों लिया! इसका कारन है आप का और उसके बिच में नहीं होने वाला विचार विमर्श! आप के संस्कार जो उसे आप ने देने थे पर आप ने बाहरी दुनिया को फीस के नाम पे एक मोटी रकम देके अपना पल्ला झाड़ लिया और आप आज ये दिन देख रहे है! आप को क्या लगता है की आप के मारने से या चिल्लाने से डांटने से वह सही हो जायेगा??? नहीं बिलकुल नहीं आपकी ये हरकत उसे उसकी गलती का एहसास दिला ही नहीं सकती है! १०० में ९९ केसेस में आप को यही देखने मिलेगा की असर कुछ नहीं हुआ उल्टा वह और दूर हो गया छोड़ के चला गया! या कोई जुर्म में संलिप्त हो गया, या परिवार से दुरी बना ली, या फिर परिवार उसको झेल भर रहा है! आखिर इसका इलाज क्या है! आप खुद के दिमाग पे ज़ोर डालेंगे या किसी भी समझदार व्यक्ति से पूछेंगे या जो इस दौर से गुज़र चुके है उनसे भी पूछेंगे तो आप को यही जवाब मिलेगा की काश! काश हमने बात की होती! काश हमने उसे सही ढंग से समझाया होता! काश हमने उसे हमारा समय दिया होता (समय) काश! आखिर ये काश आया क्यों? संस्कार उसे क्यों नहीं मिले! इसका सीधा सीधा जवाब है आप का समय जो आप ने सिर्फ और सिर्फ पैसो को दिया अपने परिवार को नहीं! आपने अक्षर ज्ञान, कारोबार ज्ञान, शारीरिक विकास की तरह ही संस्कार भी खरीदने की ही कोशिश की!

                 तनाव के दो कारण मैंने आप को अभी बताये एक तो सिद्धांत(नीति नियम) इनमें तत्परता जो की आप को रखनी ही है! कभी भी आप इनसे चुके तो आप को तनाव का सामना करना ही पड़ेगा! दूसरी बात आप को बताई मैंने वह थी समय की! आप को आप के समय का सही सही उपयोग लाना सीखना पड़ेगा! क्योंकि समय का दुरुपयोग तनाव का निमंत्रण है! अब आगे देखते है! तीसरी वस्तु इसमें आती है व्यवहार या यूँ कहिये आप का स्वभाव! आप का स्वभाव आप को अक्सर किसी न किसी तरह की विपदा में डालता ही है! अपने स्वाभाव में परिवर्तन लाना जरुरी होता है! अक्सर आप ने सुना होगा की इंग्लिश में कहावत है! की (FIRST IMPRESSION IS LAST IMPRESSION) अर्थात आप की पहली प्रदर्शनी ही आप की आखिरी प्रदर्शनी है! इसे ज़रा समझने की कोशिश करते है! कई बार आप ने खुद देखा होगा रियलिटी शोज में की आदमी आता है परफॉर्म करता है! अच्छी कलाकारी होने के बावजूद वह अपने  प्रदर्शित नहीं कर पाता और सेलेक्ट होने से वंचित रह जाता है! इसमें गलती किसकी है! जो सेलेक्ट करने बैठे है! उन्हें कोई दुश्मनी नहीं है! परफ़ॉर्मर से वह तो अपना काम सही तरीके से ही कर रहे है! मगर परफ़ॉर्मर अपने सही ढंग को अपनी सही काबिलियत को ओवर कॉन्फिडेंस में खो बैठा और जो उसे करना था उसके जगह कुछ और ही कर बैठा जिसका नतीजा उसने अपने आपको उस प्रतियोगिता से बाहर कर के पाया! ये भूल उसकी थी और ये भूल  थी ओवर कॉन्फिडेंस की! उसके स्वभाव की! यदि उसका स्वभाव सहज होता तो मन शांत होता और वह उन चीज़ो को सही तरीके से समझ सकता था! और जो व्यक्ति चीज़ो को सही से समझता है उसके लिए उस काम को करना आसान होता है! आप का टारगेट बड़ा रहने से कुछ नहीं होता है! उस टारगेट के प्रति वैसी बड़ी  मेहनत भी लगती है! इसीलिए सिर्फ टारगेट बड़ा होना कभी भी इस बात को पुख्ता नहीं करता है की सामने-वाला काबिल है! बल्कि उसकी मेहनत उसके काबिलियत को बताती है! उदाहरण के तौर पे देखिये! गाडी बहुत से लोग चला लेते है उन्हें गाडी के बारे में जानकारी भी काफी अच्छी होती है! काफी हद तक तो सभी हवाई जहाज की तरह भी चला लेते है! मगर क्या सब की तुलना हम नारायण कार्तिकेयन से कर सकते है? नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि जो कंट्रोल नारायण के पास है वह कंट्रोल इनके पास नहीं है!और अगर है तो भी उनके पास इनके जैसा स्वभाव नहीं इनकी जैसी शालीनता नहीं! है और जो ये सब भी कर लेते है! उन्हें आगे जाने से कोई रोक नहीं सकता है! आप को आप के स्वभाव को निर्मल बनाना है! अपने आप में शालीनता लानी है! अपने आप को सही ढंग से पेश करना है! तो ही आप  लोगो की नज़रो में आओगे! मैंने पहले भी कहा है! भीड़ का कारन बनो भीड़ नहीं! कारन सही ढंग से!
अगर आप अपने स्वभाव को चेंज नहीं करते है! तो लोग आप से दूर होंगे! हर बार आप को किसी न किसी तरह की परेशानी होगी ही होगी और ये आप के लिए बहुत जल्द एक मानसिक रोग बन के उभर जायेगी! चिड़चिड़ापन! विफल होने का ग़म ये सब आप को तनाव में दाल देगा! और फिर आप कोई भी अनचाहा दुखद कदम उठा लोगे तो इसके लिए आप अपने आप को पहचाने और मेहनत पे ध्यान दीजिये! आप का स्वभाव आप को सही कर्म के साथ सही दिशा में आगे लेके जाएगा! दूसरी बात की थी हमने व्यवहार की!




जिसे कुछ भी समझने में या गैरसमझ हुई हो तो वह हमसे संपर्क कर सकता है!

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for more you have to wait till next updation 15-06-2016

       



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